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Deal: भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सवाल

Author Icon By Dhanarekha
Updated: May 24, 2026 • 7:24 PM
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500 अरब डॉलर दावे पर बहस

नई दिल्ली: भारत और अमेरिका(US) के बीच संभावित 500 अरब डॉलर की ट्रेड डील को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो(Marco Rubio) के दावे पर आर्थिक थिंक टैंक जीटीआरआई ने गंभीर(Deal) सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस आधार पर इतनी बड़ी व्यापारिक प्रतिबद्धता की बात की जा रही थी, वह अब कमजोर पड़ चुका है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत अब भी जारी मानी जा रही है।

नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर विशेषज्ञों(Deal) की नजर बनी हुई है। जीटीआरआई के अनुसार अमेरिकी टैरिफ नीति में बदलाव के बाद भारत को मिलने वाला विशेष लाभ लगभग समाप्त हो गया। इसके साथ ही कई आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में इतनी बड़ी खरीद प्रतिबद्धता व्यावहारिक रूप से मुश्किल दिखाई देती है

टैरिफ नीति से बदला पूरा समीकरण

रिपोर्ट के अनुसार इस समझौते की शुरुआती रूपरेखा तब बनी थी जब अमेरिका भारतीय निर्यात पर प्रस्तावित टैरिफ में राहत देने पर विचार कर रहा था। लेकिन बाद में अमेरिकी न्यायिक और नीति बदलावों के कारण वह आधार कमजोर हो गया। इसी कारण विशेषज्ञ अब इस डील की व्यवहारिकता पर सवाल उठा रहे हैं।

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वैश्विक व्यापार माहौल पर असर

जीटीआरआई ने मलेशिया का उदाहरण देते हुए कहा कि कई देशों ने बदले हुए टैरिफ नियमों के बाद अपने व्यापारिक समझौतों की समीक्षा शुरू कर दी है। दूसरी ओर भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और कृषि क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं अब भी बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में नई शर्तों के साथ समझौते का ढांचा बदला जा सकता है।

500 अरब डॉलर की ट्रेड डील पर विवाद क्यों हुआ?

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ नियमों में बदलाव के बाद भारत को मिलने वाला विशेष व्यापारिक लाभ कमजोर पड़ गया। इससे इतनी बड़ी खरीद प्रतिबद्धता का आर्थिक आधार प्रभावित हुआ है। इसी वजह से इस दावे पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का आगे क्या असर हो सकता है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ऊर्जा, कृषि और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग जारी रह सकता है। भविष्य में नई शर्तों और नीतियों के साथ समझौते को फिर से आकार दिया जा सकता है।

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