थोक महंगाई 1 साल के उच्चतम स्तर 2.13% पर पहुंची
नई दिल्ली: फरवरी 2026 में थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 2.13% हो गई है, जो पिछले 12 महीनों(Inflation) का सबसे ऊंचा स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहा तनाव लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल तक जा सकती हैं। इससे न केवल पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, बल्कि माल ढुलाई की लागत बढ़ने से फल, सब्जी और हर जरूरी सामान की कीमतें भी आसमान छूने लगेंगी।
खाने-पीने और रोजमर्रा के सामान में उछाल
ताजा आंकड़ों के अनुसार, प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई 2.21% से बढ़कर 3.27% हो गई है। सबसे ज्यादा असर फूड इंडेक्स पर पड़ा है, जो पिछले महीने के नकारात्मक स्तर(Negative Level) से उछलकर 1.85% पर आ गया है। इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स(Inflation) और फ्यूल-पावर की दरों में भी बढ़त देखी गई है, जिसका मतलब है कि आने वाले समय में फैक्ट्री से निकलने वाला सामान भी महंगा होने वाला है।
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थोक महंगाई (WPI) और आम जनता पर प्रभाव
इसका सीधा असर आम आदमी पर तब पड़ता है जब कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल देती हैं। WPI में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का हिस्सा सबसे ज्यादा (64.23%) होता है। अगर थोक कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो खुदरा महंगाई(Inflation) भी बढ़ती है। फिलहाल रिटेल महंगाई भी बढ़कर 3.21% पर पहुंच गई है, जो यह संकेत देती है कि घर का बजट संभालना अब और चुनौतीपूर्ण होगा।
थोक महंगाई (WPI) और रिटेल महंगाई (CPI) में मुख्य अंतर क्या है?
इसका (WPI) उन कीमतों को मापती है जो व्यापारी थोक बाजार में एक-दूसरे से लेते हैं, जबकि रिटेल महंगाई (CPI) उन कीमतों पर आधारित होती है जो आम ग्राहक सामान खरीदते समय चुकाते हैं।
ईरान-इजराइल युद्ध का भारत में महंगाई पर क्या असर पड़ सकता है?
युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई बाधित हो सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे। ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ जाता है, जिससे अंततः फल, सब्जियां और अन्य जरूरी सामान महंगे हो जाते हैं।
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