IPO: IPO मार्केट में हलचल

By Dhanarekha | Updated: February 14, 2026 • 2:37 PM

ड्यूरोफ्लेक्स और हेक्सागन न्यूट्रिशन समेत 5 कंपनियों को SEBI की मंजूरी

नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार नियामक SEBI ने ड्यूरोफ्लेक्स, हेक्सागन न्यूट्रिशन, प्रीमियर इंडस्ट्रियल, विरूपाक्ष ऑर्गेनिक्स और ओम पावर ट्रांसमिशन के आईपीओ (IPO) को हरी झंडी दे दी है। 13 फरवरी को सेबी ने इन कंपनियों के ड्राफ्ट पेपर्स पर अपनी सकारात्मक ‘ऑब्जर्वेशन’ जारी की। इसका सीधा मतलब यह है कि ये कंपनियां अब अगले कुछ महीनों में अपना पब्लिक इश्यू बाजार में ला सकेंगी और निवेशकों को इनमें पैसा लगाने का मौका मिलेगा

विविध सेक्टरों का मिश्रण: फार्मा से लेकर स्लीप सॉल्यूशंस तक

इस बार की मंजूरी में अलग-अलग सेक्टर की कंपनियां शामिल हैं। ड्यूरोफ्लेक्स जहां अपने मशहूर ऑर्थोपेडिक मैट्रेस और स्लीप सॉल्यूशंस के लिए जानी जाती है, वहीं विरूपाक्ष ऑर्गेनिक्स एक रिसर्च-बेस्ड फार्मास्युटिकल कंपनी है जो दवाइयों के लिए API बनाती है। प्रीमियर इंडस्ट्रियल वेल्डिंग उद्योग के लिए कच्चा माल तैयार करती है, ओम पावर इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सक्रिय है, और हेक्सागन न्यूट्रिशन बच्चों के हेल्थ ड्रिंक्स और न्यूट्रिशन प्रीमिक्स की बड़ी सप्लायर है।

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फंड जुटाने की रणनीति: फ्रेश इश्यू बनाम ऑफर फॉर सेल (OFS)

ये कंपनियां फ्रेश इश्यू और ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए पूंजी जुटाएंगी। उदाहरण के लिए, विरूपाक्ष ऑर्गेनिक्स का ₹740 करोड़ का आईपीओ पूरी तरह से फ्रेश इश्यू होगा, जिसका पैसा सीधे कंपनी के विस्तार में लगेगा। इसके विपरीत, हेक्सागन(IPO) न्यूट्रिशन का इश्यू पूरी तरह OFS होगा, जिसमें मौजूदा निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे। ड्यूरोफ्लेक्स और अन्य कंपनियां दोनों का मिला-जुला इस्तेमाल करेंगी ताकि वे अपना कर्ज चुका सकें और कार्यशील पूंजी (Working Capital) की जरूरतों को पूरा कर सकें।

सेबी (SEBI) की ‘ऑब्जर्वेशन’ मिलने का क्या अर्थ होता है?

जब सेबी किसी कंपनी के ड्राफ्ट पेपर्स (IPO) पर अपनी ‘ऑब्जर्वेशन’ जारी करता है, तो इसका मतलब है कि नियामक को कंपनी की दी गई जानकारी पर कोई आपत्ति नहीं है। यह आईपीओ लाने की प्रक्रिया का अंतिम वैधानिक चरण होता है, जिसके बाद कंपनी अपनी लिस्टिंग की तारीख और प्राइस बैंड तय कर सकती है।

‘फ्रेश इश्यू’ और ‘ऑफर फॉर सेल’ (OFS) में निवेशक के लिए क्या अंतर है?

‘फ्रेश इश्यू’ में निवेशक जो पैसा लगाते हैं, वह सीधे कंपनी के पास जाता है जिसका उपयोग बिजनेस बढ़ाने या कर्ज कम करने में होता है। वहीं ‘OFS’ में निवेशक का पैसा उन पुराने शेयरधारकों या प्रमोटर्स के पास जाता है जो अपनी हिस्सेदारी बेच रहे होते हैं, इससे कंपनी के पास कोई नया फंड नहीं आता।

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