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Rupee: भारतीय रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर

Author Icon By Dhanarekha
Updated: April 30, 2026 • 3:22 PM
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पहली बार $1 के मुकाबले ₹95.20 का आंकड़ा पार

नई दिल्ली: भारतीय रुपया आज यानी 30 अप्रैल 2026 को डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर ₹95.20 पर पहुंच गया है। इस भारी गिरावट के पीछे मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध(War) और ऊर्जा आपूर्ति में आई रुकावटों को प्रमुख कारण माना जा रहा है। विदेशी ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन के अनुसार, यदि ईरान के साथ संघर्ष इसी तरह जारी रहा, तो रुपया और कमजोर होकर ₹98 के स्तर तक गिर सकता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय बाजार से लगातार की जा रही बिकवाली ने भी रुपए पर दबाव बढ़ा दिया है

आम जनता और अर्थव्यवस्था पर असर

डॉलर के मुकाबले रुपए की कमजोरी का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला है। चूंकि भारत कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामानों का बड़ा आयातक है, इसलिए डॉलर महंगा होने से पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस (LPG) और मोबाइल-लैपटॉप जैसी चीजों की कीमतें बढ़ जाएंगी। इसके अलावा, जो छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं या जो लोग विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं, उन्हें अब डॉलर खरीदने के लिए पहले की तुलना में अधिक रुपए खर्च करने होंगे, जिससे उनका बजट काफी बढ़ जाएगा।

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मुद्रा अवमूल्यन और विदेशी मुद्रा भंडार

किसी भी देश की करेंसी की वैल्यू उसके विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Currency Reserve) और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मांग पर निर्भर करती है। जब अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए डॉलर की मांग बढ़ती है और घरेलू बाजार से विदेशी पूंजी बाहर जाने लगती है, तो करेंसी कमजोर होती है (जिसे करेंसी डेप्रिसिएशन कहते हैं)। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की कमी रुपए की स्थिरता को प्रभावित कर रही है, जिससे आयात बिल महंगा हो रहा है और देश में रिटेल महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

रुपए के कमजोर होने से भारत में महंगाई क्यों बढ़ती है?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल और कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण विदेशों से आयात करता है, जिनका भुगतान डॉलर में किया जाता है। जब रुपया गिरता है, तो हमें उन्हीं चीजों के लिए ज्यादा रुपए देने पड़ते हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन (डीजल के कारण) और मैन्युफैक्चरिंग लागत बढ़ जाती है, जिससे अंततः बाजार में सामान महंगा हो जाता है।

‘करेंसी डेप्रिसिएशन’ से आप क्या समझते हैं?

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों या मांग-आपूर्ति के कारण किसी देश की मुद्रा की वैल्यू दूसरी प्रमुख विदेशी मुद्रा (जैसे डॉलर) के मुकाबले कम हो जाती है, तो इसे करेंसी डेप्रिसिएशन या मुद्रा का गिरना कहते हैं।

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