92.33 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा भारतीय मुद्रा
नई दिल्ली: 9 मार्च को भारतीय रुपया(Rupee) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 46 पैसे की गिरावट के साथ 92.33 के अपने सर्वकालिक निचले स्तर (All-time low) पर आ गया है। इस गिरावट के पीछे मिडिल-ईस्ट में चल रहा युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में आया भारी उछाल मुख्य कारण हैं। वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशक ‘सेफ हेवन’ के रूप में डॉलर की ओर भाग रहे हैं, जिससे डॉलर अत्यधिक मजबूत हो गया है। वर्ष 2026 में अब तक भारतीय रुपया इमर्जिंग मार्केट्स की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक साबित हुआ है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का दबाव
रुपए की कमजोरी में ब्रेंट क्रूड की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतें 25% उछलकर 117 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। चूँकि भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए रिफाइनिंग कंपनियों(Rupee) को डॉलर खरीदने के लिए अधिक खर्च करना पड़ रहा है। बाजार में डॉलर की बढ़ती मांग और आपूर्ति की कमी सीधे तौर पर रुपए के अवमूल्यन (Currency Depreciation) को बढ़ावा दे रही है।
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आम आदमी की जेब और अर्थव्यवस्था पर सीधा असर
रुपए के इस रिकॉर्ड स्तर पर गिरने से आम नागरिक पर महंगाई का सीधा असर पड़ेगा। विदेशों में पढ़ाई और यात्रा महंगी हो जाएगी, क्योंकि अब डॉलर खरीदने के लिए अधिक भारतीय मुद्रा खर्च करनी होगी। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल और विदेश(Rupee) से आयात होने वाला कच्चा माल भी महंगा हो जाएगा, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ सकती है। यदि तेल की कीमतें इसी तरह बनी रहीं, तो भविष्य में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से इंकार नहीं किया जा सकता।
रुपए की कीमत गिरने से विदेश से आयातित वस्तुओं पर क्या फर्क पड़ेगा?
रुपया कमजोर होने का मतलब है कि हमें विदेशी वस्तुओं के भुगतान के लिए अधिक पैसे चुकाने होंगे। इससे मोबाइल, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स, जो मुख्य रूप से डॉलर में खरीदे जाते हैं, महंगे हो जाएंगे।
मुद्रा अवमूल्यन क्या है और यह क्यों होता है?
मुद्रा का कमजोर होना (डेप्रिसिएशन) तब होता है जब विदेशी मुद्रा (जैसे डॉलर) की मांग उसकी आपूर्ति से अधिक हो जाती है। हमारे विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में डॉलर कम होने से रुपए की कीमत गिरने लगती है।
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