GDP- तीन साल बाद राज्यों का राजकोषीय घाटा 3% के पार

By Anuj Kumar | Updated: January 25, 2026 • 8:39 AM

नई दिल्ली, । लगातार तीन साल तक अपने खर्चों को काबू में रखने के बाद, भारतीय राज्यों का राजकोषीय घाटा एक बार फिर बढ़ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट (Report) के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों का कुल घाटा बढ़कर जीडीपी (GDP) के 3.3 प्रतिशत पर पहुंच गया है, जो इससे पहले 3 प्रतिशत से नीचे बना हुआ था।

विकास कार्यों के लिए लिया गया ब्याज-मुक्त कर्ज

हालांकि, राहत की बात यह है कि घाटे में यह बढ़ोतरी राज्यों की खराब वित्तीय स्थिति के कारण नहीं, बल्कि विकास कार्यों (पूंजीगत निवेश) के लिए केंद्र सरकार से मिले 50 साल के ब्याज-मुक्त कर्ज को लेने की वजह से हुई है।

आरबीआई की सफाई: 3% से ऊपर जाना खराब प्रबंधन नहीं

आरबीआई (RBI) की रिपोर्ट में बताया गया है कि घाटे का 3 प्रतिशत की सीमा से ऊपर जाना अनिवार्य रूप से खराब वित्तीय प्रबंधन का संकेत नहीं है। यह वृद्धि मुख्य रूप से केंद्र सरकार की ओर से पूंजीगत निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना के तहत दिए गए 50 वर्षीय ब्याज-मुक्त ऋणों को दर्शाती है।

शुद्ध उधारी सीमा से ऊपर गई उधारी का असर

यह उधारी राज्यों की सामान्य शुद्ध उधार सीमा से ऊपर है, जिसका सीधा असर राजकोषीय आंकड़ों पर पड़ा है।

2025-26 में भी 3.3% घाटे का अनुमान

आगामी वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भी राज्यों ने अपने सकल राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 प्रतिशत पर ही बजट किया है। हालांकि इस दौरान राजस्व व्यय को नियंत्रित करके खर्च की संरचना में सुधार करने का लक्ष्य रखा गया है।

राज्यों के लिए नई चुनौती और अवसर

इस वर्ष की आरबीआई रिपोर्ट का केंद्रीय विषय भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण: राज्य वित्त के लिए निहितार्थ रहा। रिपोर्ट में बताया गया है कि बदलती जनसांख्यिकी किस तरह राज्यों के खजाने को प्रभावित कर रही है।

युवा राज्यों को डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने की सलाह

आरबीआई के अनुसार, युवा राज्यों के पास कामकाजी उम्र की बढ़ती आबादी और मजबूत राजस्व जुटाने की क्षमता का लाभ उठाने का अवसर है। ऐसे राज्यों को मानव पूंजी निवेश को मजबूत करने की सलाह दी गई है।

मध्यवर्ती और वृद्ध राज्यों के लिए अलग रणनीति जरूरी

मध्यवर्ती राज्यों को विकास की प्राथमिकताओं को संतुलित करते हुए भविष्य में आबादी के वृद्ध होने की स्थिति के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। वृद्ध होते राज्यों के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं, जहां सिकुड़ते कर आधार, स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन जैसे प्रतिबद्ध व्यय से राजकोषीय दबाव बढ़ रहा है।

कार्यबल नीति और पेंशन सुधारों पर जोर

आरबीआई ने ऐसे राज्यों को राजस्व क्षमता बढ़ाने, कार्यबल नीति सुधारने और पेंशन सुधारों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है।

देनदारियों में सुधार, आगे मामूली बढ़ोतरी का अनुमान

रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2021 के अंत में राज्यों की समेकित देनदारियां जीडीपी के 31 प्रतिशत के शिखर पर थीं, जो मार्च 2024 तक घटकर 28.1 प्रतिशत रह गईं। हालांकि, मार्च 2026 के अंत तक इनके बढ़कर 29.2 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है।

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कर्ज ऊंचा होने के बावजूद ऋण स्थिरता बनी

केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि कर्ज का स्तर ऊंचा होने के बावजूद ऋण स्थिरता के संकेतक अनुकूल बने हुए हैं। आरबीआई की यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं के लिए रोडमैप के रूप में काम कर सकती है।

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