Barsi village of Saharanpur : यूपी के इस गांव में नहीं होता होलिका दहन

By Surekha Bhosle | Updated: February 27, 2026 • 1:05 PM

महाभारत काल से जुड़ी है कहानी

उत्तर प्रदेश के एक छोटे गांव में होलिका दहन की परंपरा नहीं होती। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह परंपरा महाभारत काल से जुड़ी हुई है।

महाभारत से जुड़ी मान्यता

कहानी के अनुसार, इस गांव में पांडवों से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण इतिहास है। माना जाता है कि पांडवों ने अपने समय में यहाँ कोई महत्वपूर्ण कार्य किया था, और तब से होलिका दहन का उत्सव नहीं मनाया जाता।

सहारनपुर के बरसी गांव में हजारों साल पुरानी परंपरा के कारण (Holika Dahan) होलिका दहन नहीं किया जाता. ग्रामीणों की मान्यता है कि गांव के प्राचीन शिव मंदिर में भगवान शिव का वास है और होलिका की अग्नि से उनके चरण झुलस सकते हैं, इसलिए यहां आज भी यह परंपरा नहीं निभाई जाती।

सहारनपुर शहर से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित बरसी गांव अपनी एक अनोखी और हजारों साल पुरानी परंपरा के कारण हर साल होली (Holi) के समय खास चर्चा में रहता है. यहां रंग-गुलाल के साथ होली तो मनाई जाती है, लेकिन गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता।

ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है. मान्यता है कि गांव के पश्चिमी छोर पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्वयं भगवान शिव का वास माना जाता है और यदि गांव में होलिका दहन किया गया, तो उसकी अग्नि से भोलेनाथ के चरण झुलसते हैं. इसी आस्था के चलते बरसी गांव में आज तक होलिका दहन की रस्म नहीं निभाई जाती।

सहारनपुर गांव में होली का पर्व आपसी भाईचारे और पारंपरिक ढंग से मनाया जाता है, लेकिन होलिका दहन के लिए गांव की विवाहित बेटियां और महिलाएं पास के गांव में जाकर पूजन करती हैं।

बरसी गांव में स्थित शिव मंदिर महाभारतकालीन सिद्धपीठ

ग्रामीणों का कहना है कि बरसी गांव में स्थित शिव मंदिर महाभारतकालीन सिद्धपीठ माना जाता है, जहां प्राचीन काल से स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है. इस मंदिर को लेकर भी कई लोककथाएं प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार मंदिर का निर्माण कौरव पुत्र दुर्योधन द्वारा कराया गया था।

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कथा के अनुसार जब सुबह के समय पांडव पुत्र भीम ने यह देखा कि मंदिर कौरवों द्वारा बनवाया गया है, तो उन्होंने अपनी गदा से मंदिर के मुख्य द्वार पर प्रहार कर उसका मुख पूर्व दिशा से मोड़कर पश्चिम दिशा की ओर कर दिया. इसी वजह से इस मंदिर को पश्चिमाभिमुख शिव मंदिर माना जाता है।

ग्रामीणों का विश्वास है कि यह बदलाव केवल स्थापत्य नहीं, बल्कि गांव की रक्षा और धार्मिक संतुलन से भी जुड़ा है. एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण भी युद्ध के समय कुरुक्षेत्र जाते हुए इस गांव में रुके थे और इस स्थान को विशेष धार्मिक महत्व दिया था. समय के साथ इसी मान्यता से गांव का नाम बरसी पड़ गया।

ग्रामीणों का कहना है कि बदलते दौर के बावजूद बरसी गांव आज भी अपनी परंपरा पर अडिग है. होली के रंग और उल्लास के बीच यहां होलिका दहन न कर भगवान शिव के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है।

यही वजह है कि बरसी गांव की पहचान आज भी उस अनोखी मान्यता से जुड़ी है, जिसमें कहा जाता है कि होलिका दहन की आग से शिव के चरण झुलसते हैं, इसलिए इस गांव में होलिका नहीं जलाई जातीv

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