राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव में स्थित खाटू श्याम देवालय कलियुग में आस्था का एक प्रधान केंद्र है। जिन्हें बाबा श्याम के नाम से जाना जाता है, वे महाभारत के वीर योद्धा बर्बरीक के ही रूप हैं। बर्बरीक, भीम के पौत्र और घटोत्कच के बेटा थे।
बर्बरीक और उनका अद्भुत बल
बर्बरीक बचपन से ही परम धनुर्धर थे। देवी की अनुग्रह से उन्हें तीन दिव्य बाण प्राप्त हुए थे, जिनकी ताकत इतनी थी कि वे किसी भी संग्राम का परिणाम पल भर में बदल सकते थे। उनकी प्रतिज्ञा थी कि वे केवल उसी पक्ष से संग्राम करेंगे जो हार रहा होगा।
श्रीकृष्ण की आज़माइश और शीशदान
महाभारत संग्राम से पूर्व श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की परख लेने के लिए ब्राह्मण वेश में उनसे उनका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने संग्राम में भाग न लेने की शर्त पर स्वयं अपना शीश श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया। इसी न्यौछावर के कारण उन्हें कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण के रूप में पूजित होने का आशीर्वाद मिला।
खाटू में बाबा श्याम का प्रकट होना
कहा जाता है कि बर्बरीक का शीश राजस्थान के खाटू में प्रकट हुआ था। उसी क्षेत्र पर आज भव्य खाटू श्याम देवालय बसे हुए है, जहाँ हर साल फाल्गुन शुक्ल एकादशी से द्वादशी तक विशाल मेला लगता है।
बाबा श्याम की प्रतिष्ठा
बाबा श्याम को “हारे का सहारा” कहा जाता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से श्याम बाबा का नाम लेता है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है। उनका स्मरण मात्र भी भक्तों के कष्टों का नाश करता है।
खाटू श्याम धर्मस्थल का इतिहास
वर्तमान देवालय की आधारशिला सन् 1720 में रखी गई थी। इससे पूर्व औरंगजेब की सेना ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया था, जिसकी रक्षा हेतु कई राजपूतों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।