Swami Avimukteshwaranand :  स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कौन हैं?

By Surekha Bhosle | Updated: January 21, 2026 • 12:16 PM

जगाही नर धार्मिक गुरु और शंकराचार्य दावे से जुड़े पहलू

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक धार्मिक गुरु हैं, जिन्हें ज्योतिष पीठ से जुड़े ‘शंकराचार्य’ के रूप में देखा जाता है और वे सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच सक्रिय धार्मिक प्रचार‑प्रसार करते हैं।

माघ मेले में विवाद कैसे शुरू हुआ?

‘शंकराचार्य’ पद का प्रयोग और नोटिस- प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ‘शंकराचार्य’ शीर्षक का प्रयोग करने पर नोटिस जारी किया, क्योंकि इस पद के दावे पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित विवाद और रोक है। प्रशासन ने उनसे 24 घंटे के भीतर स्पष्ट करने को कहा कि वे यह शीर्षक किस आधार पर उपयोग कर रहे हैं।

Swami Avimukteshwaranand: संगम नगरी प्रयागराज में चल रहा माघ मेला (Magh Mela) इन दिनों भक्ति के साथ-साथ विवादों का केंद्र बन गया है. विवाद की धुरी बने हैं ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती. मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब उनके शंकराचार्य पद की वैधता तक पहुंच गया है. आइए जानते हैं कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और क्यों उनके इर्द-गिर्द हमेशा चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है।

Swami Avimukteshwaranand Shankaracharya Controversy: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर सुर्खियों में हैं. वजह बना है प्रयागराज (Prayagraj) का माघ मेला, जहां मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर उनका और प्रशासन का आमना-सामना हो गया. मामला इतना बढ़ा कि साधु-संत, राजनीति और प्रशासन आमने-सामने आ गए. हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवादों के केंद्र में आए हों. अपनी मुखर राय, बेबाक बयानों और सनातन परंपराओं की खुली पैरवी के कारण वे पहले भी कई बार चर्चा में रह चुके हैं. आइए जानते हैं, आखिर कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, जिनके एक फैसले ने माघ मेले को विवादों का अखाड़ा बना दिया।

कब और कहां हुआ जन्म?

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है. उनका जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था. वे एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते हैं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ में ही हुई, लेकिन बचपन से ही उनका झुकाव धार्मिक और बौद्धिक विषयों की ओर रहा।

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गुजरात से वाराणसी तक का सफर

उच्च शिक्षा और धार्मिक अध्ययन के लिए वे गुजरात पहुंचे. वहीं उनका संपर्क स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुआ. यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई. ब्रह्मचारी राम चैतन्य के मार्गदर्शन में उन्होंने संस्कृत और शास्त्रीय अध्ययन की राह पकड़ी. इसके बाद वे वाराणसी आए और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की उपाधि प्राप्त की. इस दौरान वे केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहे, बल्कि छात्र राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई. 1994 में छात्रसंघ चुनाव जीतना उनके नेतृत्व कौशल का प्रमाण माना जाता है।

कैसे बने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती?

उन्होंने संस्कृत व्याकरण, वेद, पुराण, उपनिषद, वेदांत, आयुर्वेद और शास्त्रों की गहन शिक्षा के बाद 1990 के दशक में उन्होंने संन्यास लिया. स्वामी करपात्री जी के अस्वस्थ होने पर वे उनकी सेवा में जुट गए और अंतिम समय तक उनके साथ रहे. इसी दौरान उनका संपर्क ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुआ. 15 अप्रैल 2003 को उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा दी गई और तभी उन्हें नाम मिला स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती।

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