SC 18%, वोक्कालिगा-लिंगायत 25% से कम, फिर मुस्लिमों को कितना हिस्सा? 85% आरक्षण पर मचा सियासी भूचाल
भारत में आरक्षण एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा रहा है। लेकिन अब इस बहस ने एक नया मोड़ ले लिया है, जब 85% आरक्षण की नीति को लेकर राजनीतिक हलकों में तूफान खड़ा हो गया है।
सवाल उठ रहा है कि जब अनुसूचित जाति (SC) की आबादी लगभग 18% है, वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय मिलकर भी 25% से कम हैं, तो बाकी हिस्से में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी कितनी है?
85% आरक्षण: किसे और क्यों?
कर्नाटक जैसे राज्यों में जाति आधारित जनगणना के बाद यह तर्क सामने आया कि OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक समुदायों को मिलाकर 85% आबादी बनती है। इसके आधार पर सरकार ने नौकरियों और शिक्षा में 85% आरक्षण का प्रस्ताव रखा।
हालांकि यह प्रस्ताव संविधान में तय 50% आरक्षण की सीमा से कहीं अधिक है, जिससे कानूनी बहस भी शुरू हो गई है।
मुस्लिमों की भागीदारी पर उठे सवाल
कई राजनीतिक विश्लेषकों और विरोधी दलों ने सवाल उठाए हैं कि मुस्लिम समुदाय की वास्तविक जनसंख्या कितनी है और उन्हें इस 85% में से कितना हिस्सा दिया जाएगा?
हालांकि आधिकारिक आंकड़े यह बताते हैं कि कर्नाटक में मुस्लिम आबादी लगभग 13% है, लेकिन उनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को देखते हुए उन्हें OBC या अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर आरक्षण देने की वकालत की जा रही है।
वोक्कालिगा और लिंगायत: दोनों साथ मिलकर भी 25% से कम
राज्य की राजनीति में दो प्रभावशाली जातियाँ—वोक्कालिगा और लिंगायत—काफी प्रभावशाली मानी जाती हैं। लेकिन सामाजिक समीकरण यह बताते हैं कि दोनों को मिलाकर भी इनकी आबादी 25% से कम है। ऐसे में सवाल है कि यदि आरक्षण जातिगत आधार पर बांटा जा रहा है तो अनुपात किस आधार पर तय किया जा रहा है?
राजनीतिक बवाल और विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उनका कहना है कि आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है और इसका उद्देश्य वोट बैंक की राजनीति से जुड़ा है।
कुछ नेताओं ने यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की बात कही है क्योंकि संविधान में आरक्षण की सीमा 50% तय की गई है।
सामाजिक संगठनों की राय
कई सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि यदि 85% आरक्षण देना है, तो पहले सटीक जनगणना और सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट जारी की जाए ताकि आरक्षण का वितरण न्यायसंगत हो।
आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय को राजनीतिक हथियार बनाने से समाज में असमानता की खाई और गहरी हो सकती है। जब SC, लिंगायत, वोक्कालिगा और मुस्लिम जैसे समुदायों की जनसंख्या ही स्पष्ट रूप से सामने नहीं है, तो 85% आरक्षण का फार्मूला सवालों के घेरे में आना स्वाभाविक है।
जरूरत इस बात की है कि आरक्षण पर हर कदम सोच-समझकर, संवैधानिक दायरे में और आंकड़ों के आधार पर उठाया जाए।