बायोगैस संयंत्र से एलपीजी और जलाऊ लकड़ी की खपत में आई कमी
हैदराबाद। उस्मानिया विश्वविद्यालय (ओयू) के महिला छात्रावासों में बायोगैस संयंत्र की स्थापना से एलपीजी के उपयोग और जलाऊ लकड़ी की खपत में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे परिसर अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बन गया है। दिसंबर 2024 में ओयू के महिला छात्रावास परिसर में महालक्ष्मी बायोगैस प्लांट का उद्घाटन किया गया। प्लांट की स्थापना साहस ने केपीएमजी इंडिया द्वारा वित्तपोषित रीसेट सीएसआर पहल के तहत की थी।
इस कंपनी ने लगाया बायोगैस संयंत्र
प्लांट लगाने वाली आहूजा इंजीनियरिंग कंपनी के संचालक संदीप ने खाद्य अपशिष्ट से Biogas बनाने की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कहा, ‘हमने सभी छात्रावासों के मेस में विशेष कूड़ेदानों की व्यवस्था की है। प्लांट में 2 टन गीला (खाद्य) कचरा संसाधित होता है, जिसे प्रतिदिन छात्रावासों के मेस से एकत्र किया जाता है और इलेक्ट्रिक वाहन के माध्यम से साइट पर ले जाया जाता है।’ साइट पर, डिब्बों का वजन किया जाता है और खाद्य अपशिष्ट को छंटाई की मेज पर पहुँचाया जाता है, जहाँ इसे क्रशर में कुचल दिया जाता है और घोल के साथ मिलाकर डाइजेस्टर टैंक में डाला जाता है। ऑपरेटर ने बताया कि यहाँ डाइजेस्टर में अवायवीय पाचन होता है जिससे Biogas बनती है।
एक टैंक में बनाई जाती है बायोगैस
Biogas एक टैंक में बनाई जाती है और फिर एचटूएस और नमी को अवशोषित करने के लिए एचटूएस और वॉटर ट्रैप स्क्रबर से होकर गुजरती है। इस प्रक्रिया में, Biogas को लगभग 60% मीथेन सामग्री तक शुद्ध किया जाता है। इस शुद्ध गैस को Biogas स्टोरेज बैलून में संग्रहित किया जाता है, जहाँ से इसे पाइपलाइन सिस्टम के माध्यम से रसोई में आपूर्ति की जाती है। उन्होंने कहा, ‘हमने छात्रावास में रहने वाले लोगों के लिए भोजन तैयार करने के लिए रसोई में बायोगैस स्टोव उपलब्ध कराए हैं। इस बायोगैस के माध्यम से 300 से 400 सदस्यों के लिए भोजन तैयार किया जा सकता है।’
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