- अमेरिका में 15 हजार भारतीय टेक कर्मियों की नौकरी गई
- H-1B वीजा धारकों पर डिपोर्टेशन का खतरा बढ़ा
- नई नौकरी खोजने के लिए सिर्फ 60 दिनों का समय
वॉशिंगटन,। अमेरिका में 15 हजार भारतीय टेक कर्मियों (Indian tech workers ) की नौकरी जाने के बाद उनके सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। अब उन पर डिपोर्टेशन का खतरा मंडरा रहा है।
H-1B वीजा धारकों के सामने नई चुनौती
दरअसल, ये सभी एच-1बी वीजा (H-1 Visa) पर अमेरिका गए थे, लेकिन छंटनी के बाद इनके पास नई नौकरी ढूंढने और वीजा स्टेटस बचाने के लिए सीमित समय है। नियमों के तहत नौकरी जाने के बाद उन्हें 60 दिनों के भीतर नई नौकरी खोजनी होगी। इस दौरान नया एम्प्लॉयर या स्पॉन्सर (Sponser) नहीं मिला, तो अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।
बड़ी टेक कंपनियों में हुई भारी छंटनी
बीते दिनों मेटा, अमेजन और ओरेकल (Oracle) जैसी बड़ी टेक कंपनियों में करीब 50 हजार लोगों की छंटनी और रिस्ट्रक्चरिंग हुई है। इनमें 15 हजार से ज्यादा भारतीय शामिल बताए जा रहे हैं।
वीजा स्पॉन्सरशिप मिलना हुआ मुश्किल
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पहले नौकरी जाने पर टेक कर्मियों को जल्दी नया मौका मिल जाता था, लेकिन अब इंटरव्यू प्रक्रिया लंबी होती जा रही है। कंपनियां वीजा स्पॉन्सर करने से बच रही हैं और ट्रम्प प्रशासन की नई नीतियों के चलते उनके पास वीजा कोटा भी कम है।
ट्रम्प प्रशासन की सख्त नीति का असर
ट्रम्प प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीति ने भी डर को बढ़ा दिया है। छोटी गलती, दस्तावेजों की कमी या वीजा नियमों में चूक भी बड़ा खतरा बन रही है। अब नौकरी जाने पर उसी सेक्टर और उसी स्तर की नौकरी मिलनी जरूरी होगी। यानी सॉफ्टवेयर इंजीनियर किसी दूसरे पेशे में जाकर H-1B स्टेटस नहीं बचा सकता।
ग्रीन कार्ड प्रक्रिया भी हुई कठिन
ट्रम्प प्रशासन ने ग्रीन कार्ड प्रक्रिया को भी सख्त कर दिया है। अब आवेदक को अपने देश जाकर आवेदन करना होगा। पहले अमेरिका में रहते हुए ‘एडजस्टमेंट ऑफ स्टेटस’ के जरिए ग्रीन कार्ड मिल जाता था, लेकिन नई नीति से एच-1बी वीजा पर काम कर रहे भारतीयों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
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भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर
रिपोर्ट के मुताबिक जॉब बेस्ड ग्रीन कार्ड बैकलॉग में भारत सबसे आगे है। करीब 18 लाख लंबित मामलों में 11 लाख भारतीयों के हैं। नए भारतीय आवेदकों के लिए ग्रीन कार्ड का वेटिंग पीरियड 10 से 15 साल तक पहुंच चुका है।
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