Jan-Zee movement in Nepal: संविधान पुनर्लेखन और तीन दशक की लूट की जांच की मांग

By digital | Updated: September 10, 2025 • 4:03 PM

नेपाल इस समय एक ऐतिहासिक जनआंदोलन की चपेट में है, जिसका नेतृत्व नई पीढ़ी यानी जनरेशन ज़ी (Jan-Zee) कर रही है। बीते दिनों सरकार द्वारा फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और एक्स (X) जैसे कई सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लगाने के बाद हालात अचानक बिगड़ गए। यह फैसला पहले से मौजूद भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और राजनीतिक नेतृत्व की विफलताओं के खिलाफ दबे गुस्से को भड़काने वाला साबित हुआ।

आंदोलन की पृष्ठभूमि

नेपाल में लंबे समय से युवाओं में यह असंतोष रहा है कि राजनीतिक दल सत्ता में रहकर केवल अपनी तिजोरियां भरते रहे और जनता की मूल समस्याओं—रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा और पलायन—को नज़रअंदाज़ करते रहे। सोशल मीडिया पर पाबंदी ने इस असंतोष को ज्वालामुखी की तरह फोड़ दिया। आंदोलन हिंसक हुआ और देखते ही देखते प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली (KP Sharma Oli) समेत कई मंत्रियों को इस्तीफ़ा देना पड़ा

हिंसा और जनहानि

प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाबलों और युवाओं के बीच भयंकर झड़पें हुईं। आँकड़ों के मुताबिक कम से कम 19 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सौ से अधिक घायल हुए हैं। संसद, सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आवास समेत कई सरकारी और नेताओं के निजी मकानों को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। हालात काबू में रखने के लिए सेना को तैनात करना पड़ा और कई इलाकों में कर्फ़्यू लगाया गया।

युवाओं की मांगें

जन-ज़ी आंदोलन सिर्फ़ सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक-सामाजिक सुधार की मांग कर रहा है। प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

सेना और आगे की राह

वर्तमान में नेपाल की सेना स्थिति को नियंत्रित करने के साथ-साथ आंदोलनकारियों और राजनीतिक नेतृत्व के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रही है। सरकार ने सोशल मीडिया बैन वापस ले लिया है और एक जांच समिति गठित की है, जिसे 15 दिन में रिपोर्ट देनी होगी। लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या सरकार और राजनीतिक दल वास्तव में युवाओं की मांगों को गंभीरता से लेंगे या आंदोलन और गहराएगा।

नेपाल का यह आंदोलन केवल एक सरकार के खिलाफ नहीं है, बल्कि तीन दशकों से जमा भ्रष्टाचार और नेतृत्व की विफलता के खिलाफ एक जनविद्रोह है। जनरेशन ज़ी की यह जंग नेपाल के लोकतंत्र की दिशा और दशा तय कर सकती है। यदि संविधान और व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव नहीं हुआ, तो यह असंतोष भविष्य में और बड़े संकट को जन्म दे सकता है।

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