Nepal- नेपाल में चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज, आरपीपी ने जारी किया घोषणा-पत्र

By Anuj Kumar | Updated: February 16, 2026 • 6:33 PM

काठमांडू। नेपाल में 5 मार्च को होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इसे लेकर सभी राजनीतिक दल अपने-अपने वादों और एजेंडों के साथ मैदान में उतर चुके हैं। इसी कड़ी में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP) ने अपना चुनावी घोषणा-पत्र जारी कर एक बार फिर बड़े सियासी मुद्दे छेड़ दिए हैं।

राजतंत्र की बहाली और हिंदू राष्ट्र का एजेंडा

आरपीपी ने अपने मेनिफेस्टो के जरिए नेपाल (Nepal) में राजतंत्र की वापसी की मांग उठाई है। पार्टी ने ‘पृथ्वी पथ’ को राष्ट्र निर्माण का मार्गदर्शक सिद्धांत बताते हुए सेक्युलरिज्म को खारिज किया है और नेपाल को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने का संकल्प दोहराया है।

घोषणा-पत्र का औपचारिक विमोचन

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष राजेंद्र लिंगदेन ने काठमांडू (Kathmandu) स्थित पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में घोषणा-पत्र जारी किया। इसमें राजतंत्र की बहाली, प्रांतीय ढांचे को खत्म कर दो-स्तरीय शासन प्रणाली लागू करने, चुनावी सुधार और बेहतर प्रशासन पर जोर दिया गया है।

आर्थिक बदलाव के छह स्तंभ

घोषणा-पत्र में आर्थिक परिवर्तन के छह स्तंभों वाले मॉडल को नेपाल की समृद्धि का आधार बताया गया है। पार्टी ने राजनीतिक स्थिरता, सुशासन, आर्थिक सुधार और सामाजिक न्याय के जरिए देश को आगे बढ़ाने का दावा किया है।

भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति

आरपीपी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की घोषणा की है। इसके तहत 1990 के बाद बड़े नेताओं और सरकारी कर्मचारियों की संपत्ति की जांच और अवैध संपत्ति जब्त करने के लिए कानूनी व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया है। पार्टी ने नारा दिया है— “हम कुचले जाएंगे, भ्रष्ट नहीं होंगे।”

इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा पर फोकस

घोषणा-पत्र में पूर्व–पश्चिम महेंद्र राजमार्ग को तीन साल में अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने और अगले 10 वर्षों को ऊर्जा उत्पादन का दशक घोषित करने का वादा भी किया गया है।

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सामाजिक न्याय और धार्मिक समानता

आरपीपी ने जाति भेदभाव, छुआछूत और सभी तरह के धार्मिक भेदभाव को अपराध घोषित करने का संकल्प लिया है। पार्टी का दावा है कि उसका विजन सभी धार्मिक समुदायों के सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा पर आधारित है। कुल मिलाकर, आरपीपी का यह घोषणा-पत्र नेपाल की राजनीति में एक बार फिर राजतंत्र, हिंदू राष्ट्र और शासन प्रणाली को लेकर बहस को तेज करता नजर आ रहा है।

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