CHINA- वैश्विक रैंकिंग में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी फिसला, चीन के विश्वविद्यालयों की बड़ी छलांग

By Anuj Kumar | Updated: January 21, 2026 • 1:14 PM

लंदन । शिक्षा के क्षेत्र में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) अब अपनी बादशाहत खोती नजर आ रही है। हाल ही में जारी वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग में न केवल हार्वर्ड, बल्कि कई अन्य प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में भी गिरावट दर्ज की गई है। वहीं चीन के प्रमुख विश्वविद्यालयों ने उल्लेखनीय उछाल के साथ वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।

हार्वर्ड की बादशाहत को झटका

लगातार कई वर्षों तक नंबर-1 स्थान पर काबिज रहने के बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रैंकिंग (Ranking) में आई गिरावट ने शिक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। यह पहली बार है जब टॉप संस्थानों की सूची में हार्वर्ड को इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा है कि उसकी वर्षों पुरानी बादशाहत पर सवाल खड़े हो गए हैं।

रैंकिंग के पैमाने और कमजोर होता स्कोर

रैंकिंग के मानकों में रिसर्च पेपर की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय छात्रों का अनुपात, फैकल्टी का अकादमिक योगदान और वैश्विक प्रभाव जैसे प्रमुख पैमाने शामिल हैं। इन सभी पहलुओं पर हार्वर्ड का स्कोर पहले की तुलना में कमजोर हुआ है।

अमेरिकी विश्वविद्यालयों की सामूहिक गिरावट

हार्वर्ड के साथ-साथ कई अन्य नामी अमेरिकी विश्वविद्यालय भी रैंकिंग में पिछड़े हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि यह गिरावट किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे अमेरिकी उच्च शिक्षा तंत्र से जुड़ा मुद्दा बनती जा रही है।

चीनी विश्वविद्यालयों की लंबी छलांग

इस बीच चीन के विश्वविद्यालयों ने वैश्विक शिक्षा परिदृश्य में नई ताकत के रूप में खुद को स्थापित किया है। सिंघुआ यूनिवर्सिटी (Sindhua University) और पेकिंग यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों ने रैंकिंग में बड़ी छलांग लगाई है।

‘डबल फर्स्ट क्लास प्लान’ का दिखा असर

चीनी सरकार द्वारा लागू किए गए ‘डबल फर्स्ट क्लास यूनिवर्सिटी प्लान’ के तहत उच्च शिक्षा और शोध में अरबों डॉलर का निवेश किया गया है। इसका सीधा असर रिसर्च आउटपुट और इनोवेशन पर देखने को मिल रहा है।

एसटीईएम रिसर्च में चीन की बढ़त

खासतौर पर विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के क्षेत्रों में चीनी विश्वविद्यालयों के शोध पत्र अब अमेरिकी संस्थानों की तुलना में अधिक बार उद्धृत किए जा रहे हैं, जिससे उनकी वैश्विक साख लगातार मजबूत हो रही है।

अमेरिकी नीतियों का असर शिक्षा पर

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों की गिरती रैंकिंग के पीछे नीतिगत परिस्थितियां भी एक बड़ा कारण हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दौरान शिक्षा और रिसर्च बजट में कटौती के संकेतों ने अमेरिकी उच्च शिक्षा प्रणाली को झटका दिया।

सख्त वीजा नियम और घटता अंतरराष्ट्रीय माहौल

इसके साथ ही विदेशी छात्रों, विशेष रूप से चीनी शोधकर्ताओं के लिए सख्त वीजा नियमों ने अमेरिकी कैंपस के अंतरराष्ट्रीय माहौल को प्रभावित किया है। फंडिंग और वैश्विक प्रतिभा दोनों पर असर पड़ने से शोध की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है।

अन्य पढ़े: Rajasthan- सुप्रीम कोर्ट का आदेश, हाईवे किनारे शराब दुकानें बंद नहीं होंगी

वैश्विक शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव के संकेत

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव किसी एक साल की रैंकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शिक्षा व्यवस्था में दीर्घकालिक बदलाव का संकेत हो सकता है। यदि अमेरिका में उच्च शिक्षा पर दबाव बना रहा, तो आने वाले वर्षों में टॉप यूनिवर्सिटी रैंकिंग में एशियाई देशों का वर्चस्व और बढ़ सकता है।

Read More :

# Ranking News #Breaking News in Hindi #Harvard University News #Hindi News #Latest news #SETM News #Sindhua University News #Visa news