बीजिंग। चीन में रिटायरमेंट के बाद भी पढ़ाई करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। अब केवल युवा ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ नागरिक भी अपनी पसंदीदा पढ़ाई पूरी करने के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं। इस उम्र में उनके पास समय और संसाधन दोनों हैं, जिससे वे फैशन डिजाइन (Faishon Design) प्रिंटमेकिंग, आभूषण निर्माण और फोटोग्राफी (Photography) जैसे पुराने शौक को फिर से जीवित कर पा रहे हैं।
उम्र नहीं, जज़्बा मायने रखता है
पहले विदेश में पढ़ाई का सपना युवाओं तक सीमित था, लेकिन अब वरिष्ठ नागरिक भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। इससे चीन की शिक्षा व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि उसे अब उम्रदराज छात्रों के लिए उपयुक्त कोर्स और सुविधाएं विकसित करनी होंगी।
इसका उदाहरण 66 वर्षीय किउ लियानरु हैं, जिन्होंने (Bournemouth Arts University) में एक शॉर्ट टर्म कोर्स में दाखिला लेकर साबित किया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। उन्होंने हॉस्टल में रहकर पढ़ाई पूरी की, ठीक वैसे ही जैसे युवा छात्र रहते हैं।
विदेश में पढ़ाई का बढ़ता चलन
किउ के लिए यह सफर आसान नहीं था। भाषा की बाधा और आवेदन प्रक्रिया की जटिलता के कारण उन्हें एक विदेशी शिक्षा कंसल्टेंसी की मदद लेनी पड़ी। इस संस्था के सह-संस्थापक जी वेनली, जो खुद 2024 में रिटायर हुए, ने बुजुर्गों के लिए एक विशेष क्लब बनाया है।
उनके अनुसार पिछले एक साल में करीब 300 वरिष्ठ नागरिक 2 से 4 सप्ताह के शॉर्ट टर्म कोर्स के लिए विदेश गए हैं। इन कोर्स की फीस 20,000 से 60,000 युआन (करीब 2.6 से 7.8 लाख रुपये) तक होती है, जिसमें हवाई यात्रा शामिल नहीं है। संस्था बड़े उम्र के छात्रों के लिए ट्रांसलेटर और शैक्षणिक सहायकों की भी व्यवस्था करती है।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
इस ट्रेंड में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय है। 85 प्रतिशत से अधिक ग्राहक महिलाएं हैं, जिन्होंने जीवनभर परिवार के लिए समय दिया और अब अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पढ़ाई रिटायरमेंट के बाद लोगों को नया उद्देश्य और आत्मविश्वास देती है।
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सीनियर इकोनॉमी का उभरता दौर
विशेषज्ञों के अनुसार यह रुझान चीन की “सीनियर इकोनॉमी” का बड़ा हिस्सा बनने जा रहा है। 2025 तक 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 32 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जो कुल आबादी का लगभग 23 प्रतिशत है। 2035 तक यह आंकड़ा 30 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों की बदलती जरूरतें और आकांक्षाएं न केवल समाज बल्कि नीति निर्धारण और शिक्षा व्यवस्था को भी नई दिशा देने वाली हैं।
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