Trump: ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’: ट्रम्प और नेतन्याहू की गुप्त बैठक और युद्ध का फैसला

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सिचुएशन रूम की सीक्रेट मीटिंग और रणनीति

वाशिंगटन: 11 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में इजराइली पीएम नेतन्याहू और राष्ट्रपति ट्रम्प(Trump) के बीच एक अत्यंत गोपनीय (Top Secret) बैठक हुई। इस दौरान नेतन्याहू ने एक घंटे का प्रेजेंटेशन देकर ट्रम्प को विश्वास दिलाया कि ईरान वर्तमान में अपनी सबसे कमजोर स्थिति में है। उन्होंने तर्क(Logic) दिया कि यदि अभी हमला किया जाता है, तो न केवल ईरान की सैन्य शक्ति और मिसाइल सिस्टम को हफ्तों में तबाह किया जा सकता है, बल्कि वहां जन-विद्रोह के जरिए सत्ता परिवर्तन भी संभव है

कैबिनेट में मतभेद और जेडी वेंस का विरोध
इस योजना पर ट्रम्प की टीम दो धड़ों में बंटी नजर आई:

समर्थक: रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ युद्ध के सबसे बड़े पैरोकार रहे, उनका मानना था कि ईरान से कभी न कभी निपटना ही होगा। विदेश मंत्री मार्को रूबियो और मुख्य रणनीतिकार सूजी वाइल्स ने भी सीमित लक्ष्यों के साथ इस योजना का समर्थन किया।

विरोधी: उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस युद्ध का सबसे कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि यह युद्ध अमेरिका के लिए बेहद महंगा साबित होगा, समर्थकों को नाराज करेगा और वैश्विक तेल आपूर्ति (होर्मुज स्ट्रेट) ठप होने से महंगाई बेकाबू हो जाएगी। जनरल डैन केन ने भी कम होते हथियार भंडार और युद्ध के बाद की अनिश्चितता पर चेतावनी दी।

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अंतिम फैसला: “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी मंजूर है”

तमाम विरोधों और खुफिया एजेंसियों की मिली-जुली रिपोर्ट के बावजूद, ट्रम्प ने अंततः सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुना। उनका मुख्य ध्यान सत्ता परिवर्तन के बजाय ईरान की टॉप लीडरशिप को खत्म करने और उसके परमाणु/मिसाइल बुनियादी ढांचे को तोड़ने पर रहा। फरवरी के अंत में, एयरफोर्स वन से ट्रम्प ने अपना अंतिम आदेश जारी किया: “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी मंजूर है। इसे रोका नहीं जाएगा।”

नेतन्याहू ने ट्रम्प को ईरान पर हमले के लिए क्या मुख्य दलील दी?

नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान की सरकार अंदरूनी तौर पर कमजोर है। उन्होंने सुझाव दिया कि हमले से न केवल सैन्य ढांचा गिरेगा, बल्कि कुर्द लड़ाकों और आंतरिक विद्रोह की मदद से ईरान में ‘रजा पहलवी’ जैसे नेताओं को सत्ता में लाकर व्यवस्था बदली जा सकती है।

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस युद्ध के खिलाफ क्यों थे?

वेंस का मानना था कि अमेरिका को एक और विदेशी युद्ध में नहीं उलझना चाहिए। उन्हें डर था कि यदि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में ‘होर्मुज की जलसंधि’ (Strait of Hormuz) को बंद कर दिया, तो दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिसका सीधा असर अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

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