IRAN- ईरान पर सख्त रुख के बाद डोनाल्ड ट्रंप का यू-टर्न, अचानक बदले तेवर

By Anuj Kumar | Updated: January 17, 2026 • 11:10 AM

वाशिंगटन,। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donlad Trump) कुछ ही दिन पहले ईरान के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाते नजर आ रहे थे। उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि ईरान में प्रदर्शनकारी संस्थानों पर कब्जा करें और अमेरिका उनकी मदद भेजने को तैयार है। यहां तक कि ईरान पर तुरंत कार्रवाई के संकेत भी दिए गए थे। लेकिन बीते 48 घंटों में हालात अचानक बदल गए और ट्रंप के तेवर नरम पड़ते दिखाई दिए।

अचानक बदले ट्रंप के सुर

गुरुवार को ट्रंप ने बयान दिया कि ईरान अब प्रदर्शनकारियों को फांसी नहीं देगा और उन्हें भरोसा है कि ऐसा नहीं किया जाएगा। इस बयान से साफ है कि ईरान (Iran) पर तत्काल सैन्य कार्रवाई का खतरा फिलहाल टल गया है। कूटनीतिक गलियारों में इसे पर्दे के पीछे चली तीव्र बातचीत का नतीजा माना जा रहा है।

चार अरब देशों की अहम कूटनीतिक भूमिका

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम में चार अरब देशों—सऊदी अरब, कतर, ओमान और मिस्र—ने निर्णायक भूमिका निभाई। एक गल्फ अधिकारी के अनुसार इन देशों ने अमेरिका और ईरान दोनों से लगातार संपर्क बनाए रखा, ताकि एक और विनाशकारी युद्ध को रोका जा सके।

वाशिंगटन और तेहरान के बीच लगातार बातचीत

सूत्रों के मुताबिक जब वाशिंगटन में ईरान पर हमले की योजना पर विचार हो रहा था, उसी दौरान रियाद, दोहा, मस्कट और काहिरा से वाशिंगटन और तेहरान (Tehran) तक फोन लाइनों पर बातचीत चल रही थी। इन देशों ने संयुक्त और समन्वित प्रयास करते हुए ट्रंप प्रशासन को समझाने की कोशिश की कि इस समय हमला करना भारी भूल साबित हो सकता है।

अमेरिका को दी गई सख्त चेतावनी

इन चारों देशों ने अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दी कि ईरान पर हमला सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल सकती है, तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और ग्लोबल सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ेगा, जिसका सीधा नुकसान अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी झेलना पड़ेगा।

ईरान को भी दिया गया कड़ा संदेश

इन देशों ने सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि ईरान को भी सख्त संदेश दिया। तेहरान को साफ शब्दों में कहा गया कि अगर उसने अमेरिकी हमले के जवाब में खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, तो उसके गंभीर नतीजे होंगे। यह भी चेताया गया कि पड़ोसी देशों को युद्ध में घसीटने पर ईरान के राजनयिक और आर्थिक संबंध पूरी तरह टूट सकते हैं।

खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंता

सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों की चिंता इसलिए भी गंभीर थी क्योंकि यहां बड़ी संख्या में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। उन्हें डर था कि अमेरिकी हमले की स्थिति में ईरान पलटवार कर इन ठिकानों या अहम ऊर्जा संयंत्रों और तेल कुओं को निशाना बना सकता है। 2019 में सऊदी अरामको पर हुए हमले की यादें अब भी ताजा हैं।

नई क्षेत्रीय रणनीति और युद्ध से दूरी

इस कूटनीति में सऊदी अरब और मिस्र की भागीदारी खास मानी जा रही है। ऐतिहासिक रूप से ईरान के विरोधी रहे ये देश अब क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दे रहे हैं। 2023 में सऊदी अरब-ईरान समझौते के बाद रियाद का फोकस ‘विजन 2030’ और आर्थिक विकास पर है। वहीं कतर और ओमान लंबे समय से पश्चिम और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते आए हैं।

फिलहाल टला युद्ध का खतरा

कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि इन चार देशों की सक्रिय मध्यस्थता ने न सिर्फ संभावित युद्ध को टाल दिया, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच बयानबाजी को भी फिलहाल थाम दिया है। हालांकि हालात अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं और आने वाले दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं।

Read More :