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National- भारत की बड़ी उपलब्धि, समुद्र से बनेगी बिजली और मीठा पानी

Author Icon By Anuj Kumar
Updated: April 2, 2026 • 10:21 AM
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नई दिल्ली। वैश्विक जल संकट के बीच भारत एक अनोखी तकनीकी पहल के जरिए समाधान की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। लक्षद्वीप के कवरत्ती द्वीप (Kawarati Deep) पर दुनिया का पहला ओटेक आधारित हाइब्रिड डिसेलिनेशन प्लांट (Hybrid Desalination Plant) तैयार किया जा रहा है, जो समुद्र से एक साथ बिजली और मीठा पानी बनाने में सक्षम होगा।

दुनिया के लिए मिसाल बन सकता है भारत का प्रयोग

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की करीब आधी आबादी साल में कम से कम एक महीने गंभीर जल संकट का सामना करती है, जबकि हर चौथा व्यक्ति शुद्ध पेयजल से वंचित है। ऐसे में समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने की तकनीकों पर कई देश काम कर रहे हैं, लेकिन भारत का यह प्रयास उन्हें एक कदम आगे ले जाता है।

एनआईओटी कर रहा है परियोजना का विकास

यह महत्वाकांक्षी परियोजना नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी (NIOT) द्वारा विकसित की जा रही है, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है। यह प्लांट ओटेक (ओसियन थर्मल एनर्जी कन्वर्सन) तकनीक पर आधारित है।

कैसे काम करेगी ओटेक तकनीक

इस तकनीक में समुद्र की सतह के गर्म पानी और गहराई में मौजूद ठंडे पानी के तापमान के अंतर का उपयोग कर ऊर्जा उत्पन्न की जाती है। इसी प्रक्रिया के दौरान समुद्री पानी को शुद्ध कर उसे पेयजल में बदला जाएगा।

समुद्र की गहराई से आएगा ठंडा पानी

इस परियोजना के तहत लगभग 3.8 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जा रही है, जो समुद्र की करीब 1000 मीटर गहराई से ठंडा पानी सतह तक लाएगी। यह पूरा सिस्टम निरंतर ऊर्जा उत्पादन और जल शुद्धिकरण में मदद करेगा।

24 घंटे बिजली और पानी की आपूर्ति

विशेषज्ञों के अनुसार, यह दुनिया का पहला ऐसा प्लांट होगा जो 24 घंटे लगातार बिजली उत्पादन और जल शुद्धिकरण दोनों कार्य एक साथ करेगा। इससे पहले लक्षद्वीप के आठ द्वीपों पर एलटीटीडी तकनीक के प्लांट संचालित हो रहे हैं, लेकिन यह नया हाइब्रिड मॉडल एक बड़ा तकनीकी उन्नयन माना जा रहा है।

लक्षद्वीप के लिए स्थायी समाधान

लक्षद्वीप में भूजल की कमी और खारे पानी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। ऐसे में यह परियोजना स्थानीय लोगों के लिए पेयजल और ऊर्जा दोनों का स्थायी और विश्वसनीय स्रोत बन सकती है।

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दुनिया के तटीय क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी मॉडल

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल होती है, तो यह न केवल भारत बल्कि दुनिया के अन्य तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों के लिए भी एक आदर्श मॉडल साबित हो सकती है।

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