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Mumbai- हादसे से पहले अजित पवार का दर्द भरा बयान-अब मुझे कुछ नहीं चाहिए अब थक चुका हूं

Author Icon By Anuj Kumar
Updated: January 29, 2026 • 11:53 AM
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मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति के दादा कहे जाने वाले उपमुख्यमंत्री अजित पवार (Ajit Pawar) का बारामती में एक दर्दनाक विमान हादसे में निधन हो गया है। यह न केवल उनकी पार्टी एनसीपी (NCP) के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि राज्य की राजनीति के एक युग का अंत भी है।

राजनीति से भीतर ही भीतर टूट चुके थे अजित पवार

पिछले कुछ वर्षों में विवादों, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और चुनावी चुनौतियों का सामना करने वाले अजित पवार अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले अंदरूनी तौर पर काफी व्यथित और थके हुए महसूस कर रहे थे। उनके सबसे करीबी मित्र और बारामती विद्या प्रतिष्ठान के ट्रस्टी किरण गूजर (Trusty Kiran Gujar) ने उनके अंतिम दिनों की उन भावुक यादों को साझा किया है, जो एक कठोर नेता के भीतर छिपे संवेदनशील इंसान को उजागर करती हैं।

1984 से साथ निभाने वाले मित्र ने खोले दिल के राज

किरण गूजर, जिन्होंने 1984 में अजित पवार को राजनीति के पहले चुनाव के लिए मनाया था, बताते हैं कि पिछले कुछ समय से अजित पवार का राजनीति से मोहभंग होने लगा था। कुछ दिन पहले ही उन्होंने गूजर से अपनी भावनाएं साझा करते हुए कहा था, “अब मुझे यह सब नहीं चाहिए, मैं थक चुका हूँ।”

आलोचनाओं और चुनावी झटकों से आहत थे दादा

गूजर के अनुसार, अजित पवार अपनी कड़ी मेहनत के बावजूद मिलने वाली आलोचनाओं और राजनीतिक झटकों से आहत थे। उन्होंने बेहद भावुक होकर अपने मित्र से पूछा था, “मैं दिन-रात इतनी मेहनत कर रहा हूँ, फिर भी मुझे यह सब क्यों सहना पड़ रहा है?”

लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद तो वे इतने टूट गए थे कि विधानसभा चुनाव लड़ने के पक्ष में भी नहीं थे, लेकिन करीबी साथियों के समझाने पर वे दोबारा सक्रिय हुए थे।

नास्तिकता से विश्वास तक का सफर

अजित पवार के व्यक्तित्व में आए बदलावों पर चर्चा करते हुए किरण गूजर बताते हैं कि शुरुआती दिनों में वे अध्यात्म और मंदिर जाने के सख्त खिलाफ थे। बचपन में पिता को खोने और परिवार की विषम परिस्थितियों के कारण उनके मन में ईश्वर को लेकर अलग सोच थी। हालांकि, उम्र और अनुभव के साथ उनके व्यवहार में नरमी आई थी। वे भगवान पर भरोसा तो करने लगे थे, लेकिन कभी अंधविश्वासी नहीं बने और न ही धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया।

आखिरी मुलाकात, आखिरी भोजन

अपनी आखिरी मुलाकात को याद करते हुए गूजर भावुक हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि मौत से महज पांच दिन पहले अजित पवार ने उनसे कहा था कि वे ऊब रहे हैं और कहीं बाहर जाना चाहते हैं। दोनों ने साथ में आधा दिन बिताया और रात का खाना खाया। वही उनके साथ आखिरी भोजन था।

हादसे से पहले आखिरी फोन कॉल

हादसे वाले दिन की दास्तां बयां करते हुए किरण गूजर ने बताया कि विमान में सवार होने से ठीक पहले अजित पवार ने उन्हें फोन किया था। वे उन्हें लेने खुद हवाई अड्डे पहुंचे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

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आंखों के सामने टूटा सपना

गूजर के सामने ही विमान क्रैश हो गया। मलबे से जब अजित पवार का पार्थिव शरीर निकाला गया, तो उन्होंने ही अपने प्रिय दादा की पहचान की। गूजर कहते हैं कि यह सब एक बुरे सपने जैसा है।

1984 से 2026 तक, एक युग का अंत

1984 में छत्रपति कारखाना चुनाव से शुरू हुआ अजित पवार का राजनीतिक सफर 2026 की इस दुखद दोपहर में हमेशा के लिए थम गया। बारामती और महाराष्ट्र की राजनीति ने अपना सबसे अनुभवी योद्धा खो दिया।

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