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West Bengal- बंगाल में मुस्लिम वोटों में बदलाव से बीजेपी को मिल सकता है फायदा

Author Icon By Anuj Kumar
Updated: April 12, 2026 • 12:36 PM
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कोलकाता। पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या इससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

क्या है SIR और एडजुडिकेशन प्रक्रिया?

SIR के तहत पुरानी मतदाता सूची (Voter List) की गहन जांच की जाती है, जिसमें मृत, स्थानांतरित या दोहरे नाम वाले वोटरों को हटाया जाता है। इस बार इसमें एडजुडिकेशन का नया चरण जोड़ा गया है, जिसमें प्रत्येक नाम की दोबारा जांच की जा रही है।

जेरिमैंडरिंग को लेकर उठे सवाल

इस प्रक्रिया के बाद यह बहस तेज हो गई है कि कहीं यह चुनावी क्षेत्रों में बदलाव या जेरिमैंडरिंग का रूप तो नहीं ले रही। जेरिमैंडरिंग का मतलब होता है वोटरों के वितरण को इस तरह बदलना कि किसी खास पार्टी को फायदा मिले।

मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा नाम कटने की चर्चा

रिपोर्ट्स के अनुसार मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम हटाने की दर अपेक्षाकृत ज्यादा रही है। चूंकि मुस्लिम वोटर आमतौर पर (Bharatiya Janata Party) की बजाय अन्य दलों का समर्थन करते रहे हैं, इसलिए इस ट्रेंड को राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।

बीजेपी को संभावित फायदा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मुस्लिम वोटरों की संख्या में गिरावट आती है, तो इसका सीधा फायदा Bharatiya Janata Party को मिल सकता है। हालांकि यह केवल संभावनाओं पर आधारित आकलन है।

पहले के राज्यों में क्या रहा अनुभव

बिहार, केरल और असम जैसे राज्यों में SIR के बाद मतदान प्रतिशत में वृद्धि देखी गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि सूची साफ होने के बाद वास्तविक वोटरों की भागीदारी बढ़ती है।

टर्नआउट बढ़ाने की चुनौती

पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनाव में 81.7% मतदान हुआ था। आगामी चुनाव में इसे लगभग 88.9% तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती होगी। कई सीटों पर मतदाताओं और वास्तविक वोटों के बीच अंतर बेहद कम है।

कुछ सीटों पर दिखा अलग ट्रेंड

रिपोर्ट के मुताबिक 67 ऐसी सीटें, जहां 2011 के बाद मुस्लिम विधायक चुने गए, वहां नाम कटने की दर ज्यादा रही। वहीं मतुआ समुदाय के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी यही रुझान देखा गया।

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क्या यह पूरी तरह चुनावी हेरफेर है?

विशेषज्ञों का कहना है कि इसे सीधे तौर पर जेरिमैंडरिंग कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि धर्म या समुदाय के आधार पर पूरा डेटा उपलब्ध नहीं है। हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट वोटर भी शामिल हो सकते हैं।

चुनाव के बाद ही साफ होगा पूरा असर

फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। अंतिम निष्कर्ष चुनाव के बाद ही सामने आएंगे, जब सीटवार मतदान और परिणामों का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा।

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