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Latest Hindi News : दिवाली का जश्न: छोटी, बड़ी और हिमाचल की ‘बूढ़ी दिवाली’

Anuj Kumar
Anuj Kumar
Latest Hindi News : दिवाली का जश्न: छोटी, बड़ी और हिमाचल की ‘बूढ़ी दिवाली’

नई दिल्ली,। देशभर में छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली हर्षोल्लास से मनाई जाती हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश में दिवाली के लगभग एक माह बाद एक खास लोक-परंपरागत पर्व मनाया जाता है जिसे ‘बूढ़ी दिवाली’ (Buddhi Diwali) कहा जाता है। यह पर्व सिरमौर, कुल्लू, शिमला और लाहौल-स्पीति जैसे जिलों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

बूढ़ी दिवाली का इतिहास

लोककथा के अनुसार, जब भगवान राम के अयोध्या लौटने और दिवाली मनाए जाने की खबर हिमालय की ऊंची पहाड़ियों तक पहुंची, तब तक एक महीना बीत चुका था। इस देरी से मिली खुशी को लोगों ने मशालें जलाकर, नाच-गाकर और मिठाइयां बांटकर मनाया। तभी से यह पर्व “बूढ़ी दिवाली” कहलाने लगा। यह पर्व मार्गशीर्ष महीने की अमावस्या को मनाया जाता है, जो दिवाली के लगभग एक माह बाद आती है। इसे देरी से प्राप्त दिवाली की खुशियों का प्रतीक माना जाता है।

मुख्य परंपराएं और रीति-रिवाज

बूढ़ी दिवाली की सबसे प्रमुख परंपरा मशाल जुलूस (Mashal Julus) है। ग्रामीण लोग हाथों में मशालें लेकर गांव-गांव घूमते हैं, जिससे पूरी घाटियां प्रकाश से जगमगा उठती हैं। इस दिन लोक गीत, नृत्य और नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं। लोग एक-दूसरे को मूड़ा, चिड़वा, शाकुली और अखरोट जैसे पारंपरिक व्यंजन बांटकर शुभकामनाएं देते हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

यह त्योहार प्रकृति और देवताओं के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। इसमें पटाखों की जगह पूजा, भक्ति और सामूहिक उत्सव को महत्व दिया जाता है। पर्व के माध्यम से परिवार, समाज और संस्कृति के प्रति एकजुटता और अपनापन प्रकट होता है। दिवाली की जगमग रोशनी के एक माह बाद, जब हिमालय की ठंडी वादियों में मशालें जलती हैं, तो ऐसा लगता है मानो दिवाली (Diwali) फिर से लौट आई हो, इस बार परंपरा और लोकसंस्कृति के रंग में रंगी हुई।

बूढ़ी दिवाली क्या है?

बूढ़ी दीवालीहिमाचल प्रदेश का एक अनोखा त्योहार है जो दीवाली के ठीक एक महीने बाद मनाया जाता है। यह त्योहार चार दिनों तक चलता है और इस दौरान मशालें जलाई जाती हैं पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर लोग झूमते हैं और विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

दिवाली की पूरी कहानी क्या है?

माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का हृदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से हर्षित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी।

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