चैन्नई । (Tamil Nadu) की राजनीति, जो लंबे समय तक आत्म-सम्मान आंदोलन, तर्कवाद और नास्तिकता के सिद्धांतों पर आधारित रही है, अब 2026 के चुनावों में एक नए बदलाव की ओर बढ़ती दिख रही है। राज्य की राजनीतिक जमीन पर धार्मिक प्रतीकों और आस्था के प्रति बढ़ती सक्रियता एक नई वैचारिक दिशा की ओर इशारा कर रही है।
बदली सियासी तस्वीर
जो नेता पहले धार्मिक कर्मकांडों के विरोधी माने जाते थे, वे अब मंदिरों में पूजा-अर्चना करते नजर आ रहे हैं। इस बदलाव को जानकार “सॉफ्ट हिंदुत्व” और व्यापक जनसमर्थन हासिल करने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।
नेताओं का बदला रुख
Udhayanidhi Stalin, जो पहले सनातन धर्म को लेकर अपने बयानों के कारण चर्चा में रहे, हाल ही में मंदिर में पूजा करते दिखे। इसी तरह पूर्व सांसद (Senthil Kumar), जो पहले धार्मिक अनुष्ठानों का विरोध करते थे, अब चुनाव प्रचार के दौरान मंदिरों का दौरा कर रहे हैं।
चुनावी रणनीति में धर्म की एंट्री
इस बार चुनाव में धार्मिक सीमाएं धुंधली होती दिख रही हैं। जहां मुस्लिम उम्मीदवार विभूति लगाकर प्रचार कर रहे हैं, वहीं हिंदू उम्मीदवार मस्जिदों में जाकर समर्थन मांग रहे हैं। यह बदलाव बताता है कि अब नेता किसी भी वर्ग को नाराज नहीं करना चाहते।
जातीय समीकरण भी अहम
राजनीतिक दल केवल धर्म ही नहीं, बल्कि जातिगत समीकरणों को भी साधने में लगे हैं। (Thangam Thenarasu) का दलित नेता Immanuel Sekaran के स्मारक पर जाना इसका उदाहरण है।
छवि निर्माण पर जोर
राजनीति में प्रतिद्वंद्विता के बीच मानवीय व्यवहार के उदाहरण भी सामने आ रहे हैं। गुम्मिडीपूंडी में V. Sudhakar ने अपने प्रतिद्वंद्वी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, जिससे उनकी विनम्र छवि उभरकर सामने आई।
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वैचारिकता से ज्यादा व्यावहारिकता
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 का यह चुनाव वैचारिक कट्टरता से ज्यादा व्यावहारिक राजनीति और समावेशी रणनीतियों पर आधारित होगा। यह बदलाव तमिलनाडु की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत दे रहा है।
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