Harivansh Narayan Singh: हरिवंश नारायण सिंह का राज्यसभा में पुनरागमन

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मनोनीत सांसद के रूप में ली शपथ

नई दिल्ली: राज्यसभा के पूर्व उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह(Harivansh Narayan Singh) एक बार फिर उच्च सदन के सदस्य बन गए हैं। इस बार उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा मनोनीत (Nominated) किया गया है। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने उन्हें उनके कक्ष में पद की शपथ दिलाई। उल्लेखनीय है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई का कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह सीट रिक्त हुई थी। हरिवंश का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था और अब वे 2032 तक राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं देंगे

उपसभापति पद की संभावना और संवैधानिक प्रावधान

हरिवंश के मनोनयन के बाद सबसे बड़ा सवाल उनकी भविष्य की भूमिका को लेकर है। संविधान के अनुच्छेद 89 के अनुसार, राज्यसभा अपने सदस्यों में से उपसभापति का चुनाव करती है। नियम स्पष्ट करते हैं कि उपसभापति बनने के लिए सदस्य का ‘निर्वाचित’ होना अनिवार्य नहीं है; एक मनोनीत सांसद भी इस पद पर आसीन हो सकता है। चूंकि हरिवंश 2018 से 2024 तक दो बार इस जिम्मेदारी को कुशलतापूर्वक संभाल चुके हैं, इसलिए राजनीतिक गलियारों में उनके दोबारा उपसभापति बनने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।

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पत्रकारिता से राजनीति तक का सफर

हरिवंश नारायण सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है। राजनीति में आने से पहले वे एक प्रखर पत्रकार थे। उन्होंने लंबे समय तक जेडीयू (JDU) के माध्यम से बिहार का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, हाल के दिनों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ उनके वैचारिक मतभेदों की खबरें चर्चा में रहीं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट सत्र के दौरान ही उनके ‘कमबैक’ का संकेत दे दिया था। कला, साहित्य और समाज सेवा में उनके योगदान को देखते हुए ही उन्हें इस बार राष्ट्रपति कोटे से सदन में भेजा गया है।

हरिवंश नारायण सिंह का नया कार्यकाल कब तक रहेगा और उन्हें किसकी जगह मनोनीत किया गया है?

उनका नया कार्यकाल वर्ष 2032 तक रहेगा। उन्हें पूर्व सीजेआई (CJI) रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद खाली हुई सीट पर मनोनीत किया गया है।

क्या कोई मनोनीत सांसद राज्यसभा का उपसभापति बन सकता है?

हाँ, संविधान के नियमों के अनुसार कोई भी राज्यसभा सदस्य (चाहे वह निर्वाचित हो या मनोनीत) उपसभापति के पद के लिए चुना जा सकता है, बशर्ते उसे सदन का बहुमत प्राप्त हो।

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