Festival- 2 मार्च को जलेगी होलिका, 4 को रंगों की होली

By Anuj Kumar | Updated: February 2, 2026 • 10:54 AM

नई दिल्ली । इस साल होली (Holi) के पर्व की तारीख को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। इसका कारण 3 मार्च 2026 को पड़ने वाला चंद्रग्रहण है। ज्योतिषीय गणनाओं और शास्त्रीय मान्यताओं के आधार पर अब स्पष्ट किया गया है कि होलिका दहन 2 मार्च को होगा, जबकि रंगों की होली 4 मार्च को खेली जाएगी।

ज्योतिषीय गणनाओं से दूर हुआ भ्रम

ज्योतिषाचार्य पंडित दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 2 मार्च को पड़ रही है। शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन भद्रा समाप्त होने के बाद या भद्रा पुच्छ काल में करना शुभ माना जाता है। उन्होंने बताया कि इस बार होलिका दहन का सबसे उत्तम मुहूर्त रात 12:50 बजे से 2:02 बजे के बीच रहेगा। इसी समय विधि-विधान से होलिका दहन करना शुभ फलदायक होगा।

3 मार्च को चंद्रग्रहण, सूतक काल रहेगा प्रभावी

लेकिन 3 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा (Fagun Purnima) के दिन चंद्रग्रहण लग रहा है। जानकारी के अनुसार, चंद्रग्रहण की शुरुआत दोपहर 3:20 बजे से होकर शाम 5:59 बजे तक रहेगी। क्योंकि ग्रहण चंद्रोदय से पहले शुरू हो जाएगा, इसलिए भारत में इसका पूरा दृश्य नहीं दिखेगा, केवल मोक्ष काल ही दिखाई देगा। चंद्रग्रहण के कारण सुबह 6:20 बजे से सूतक काल भी शुरू हो जाएगा, जिसे धार्मिक कार्यों के लिए अशुभ माना जाता है।

ग्रहण के कारण 3 मार्च को नहीं खेली जाएगी होली

ज्योतिषाचार्य के अनुसार, परंपरा में होलिका दहन (Holika Dahan) रात में होता है और अगले दिन रंगोत्सव मनाया जाता है। लेकिन इस बार 3 मार्च को ग्रहण और सूतक काल होने की वजह से उस दिन रंग खेलना उचित नहीं माना गया है। इसी कारण पूरे देश में रंगों की होली 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी।

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4 मार्च को ही मान्य होगी रंगों की होली

ज्योतिषियों के अनुसार, ग्रहण समाप्त होने के बाद 3 मार्च को चौसठ्ठी देवी यात्रा और पूजन किया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, 4 मार्च को होली खेलना ही धार्मिक रूप से सही और मान्य माना जा रहा है

होली का इतिहास क्या है?

होली के दिन भगवान शिव की तपस्या भंग हुई। उन्होंने रोष में आकर कामदेव को भस्म कर दिया तथा यह संदेश दिया कि होली पर काम (मोह, इच्छा, लालच, धन, मद) इनको अपने पर हावी न होने दें। तब से ही होली पर वसंत उत्सव एवं होली जलाने की परंपरा प्रारंभ हुई। इस घटना के बाद शिवजी ने माता पार्वती से विवाह की सम्मति दी।

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