मुंबई,। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) की ओर से चार धाम मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर बैन लगाने के ऐलान के बाद सियासत तेज हो गई है। इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता मजीद मेमन ने राज्य सरकार और मंदिर समिति के फैसले पर आपत्तियां जाहिर की हैं।
संवैधानिक अधिकारों से टकराता है फैसला: मेनन
मजीद मेमन (Majid Menon) ने कहा कि अगर राज्य सरकार या उससे जुड़ी कोई संस्था ऐसा कोई फैसला लेती है जो नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से टकराता है, तब वह लंबे समय तक टिक नहीं सकता। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और इस तरह की पाबंदियां संवैधानिक कसौटी पर कमजोर होती हैं।
कानूनी आधार के बिना पाबंदी टिकना मुश्किल
टीएमसी नेता मेनन ने कहा कि आमतौर पर जब इस तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तब उनके साथ कुछ शर्तें और कानूनी आधार भी होना चाहिए। केवल धार्मिक पहचान के आधार पर किसी वर्ग को किसी सार्वजनिक धार्मिक स्थल पर जाने से रोकना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण रहता है। उन्होंने कहा कि यदि गैर-हिंदुओं के चार धाम यात्रा या मंदिर प्रवेश पर कानूनी रूप से प्रतिबंध लगाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी जाती है, तब संभव है कि कोर्ट इस फैसले को पलट दे।
मंदिर समिति के फैसले से मचा विवाद
बता दें कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के हालिया फैसले के अनुसार, सदियों पुराने मंदिरों में सिर्फ हिंदुओं को प्रवेश मिलेगा। यह प्रस्तावित पाबंदी समिति द्वारा संचालित सभी मंदिरों पर लागू होगी, जिसमें बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम भी शामिल हैं। बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने बताया कि समिति के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है।
चार धाम यात्रा और पृष्ठभूमि
चार धाम में केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों के अलावा गंगोत्री और यमुनोत्री भी शामिल हैं। इन दोनों तीर्थस्थलों के कपाट 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन खुलने हैं। यह घोषणा उत्तराखंड में प्रमुख धार्मिक स्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर चल रही बहस के बीच सामने आई है।
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हर की पौड़ी विवाद से भी जुड़ा मामला
इस महीने की शुरुआत में हरिद्वार के हर की पौड़ी को गैर-हिंदुओं के लिए वर्जित घोषित करने वाले पोस्टर विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल पर लगाए गए थे, जिससे विवाद खड़ा हो गया था। इन पोस्टरों में हर की पौड़ी क्षेत्र को पूरी तरह से हिंदू क्षेत्र बताया गया था, जिसके बाद सार्वजनिक धार्मिक स्थलों पर धार्मिक पहुंच को लेकर बहस और तेज हो गई।
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