स्थानीय भाषा में आस्था तक पहुँच का अनोखा प्रयास
क्रिसमस के अवसर पर छत्तीसगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक अहम कहानी सामने आती है—बाइबिल का छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद, जिसने स्थानीय समाज से गहरा जुड़ाव बनाया।
विश्रामपुर: जहां से शुरू हुई कहानी
जर्मन मिशनरी ने बनवाया था पहला चर्च- छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के विश्रामपुर में प्रदेश का पहला चर्च स्थापित किया गया था। इसे एक जर्मन मिशनरी ने बनवाया, जिसने इस क्षेत्र में ईसाई धर्म के प्रसार की नींव रखी।
दुनियाभर में क्रिसमस का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में भी इस अवसर पर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। यहां कई चर्च अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। मसीही समाज के सबसे बड़े पर्व, प्रभु यीशु मसीह (Jesus Christ) (जीसस क्राइस्ट) के जन्मदिवस के मौके पर जानिए छत्तीसगढ़ में पहला चर्च कब और कहां स्थापित हुआ, और प्रदेश के कोने-कोने में ईसाई धर्म का प्रसार कैसे हुआ।
छत्तीसगढ़ में लगभग 727 चर्च हैं। हालांकि, ग्रामीण अंचलों में छोटे-छोटे चर्चों को मिलाकर इनकी संख्या 900 के पार है। इस रिपोर्ट में आप पढ़ेंगे छत्तीसगढ़ के उन चर्चों की अनसुनी कहानियां, जो इतिहास की गवाही देती हैं। साथ ही जानेंगे बाइबिल के एक अध्याय के छत्तीसगढ़ी अनुवाद की रोचक कहानी। साथ ही उस अनोखे द्वीप के बारे में, जहां 2 धार्मिक धाराओं का शांतिपूर्ण और ऐतिहासिक संगम देखने को मिलता है।
छत्तीसगढ़ में ऐसे बना पहला मिशनरी चर्च
प्रदेश के इतिहास में दर्ज पहला मिशनरी चर्च (इम्मानुएल) 18वीं सदी में बलौदाबाजार के विश्रामपुर में बना था। इसे ‘द सिटी ऑफ रेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। क्रिश्चियन समुदाय के लिए तो यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में फैले ईसाई धर्म की धारा यहीं से निकली है।
फादर लोर ने छत्तीसगढ़ के पहले चर्च की नींव रखी। 15 फरवरी 1873 को इम्मानुएल चर्च का निर्माण शुरू किया गया। 29 मार्च 1874 को यह बनकर तैयार हो गया। पत्थरों से बने, बिना कॉलम इस चर्च की सबसे बड़ी खासियत है इससे लगा हुआ कब्रिस्तान।
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यहां मुख्य प्रार्थना घर और कब्रों के बीच 10-12 फीट का रास्ता बस है। आज भी यहां शव दफनाए जाते हैं। जानकार बताते हैं कि देश में यह संभवतः पहला चर्च है, जिससे लगा हुआ कब्रिस्तान है।
फादर ऑफ विश्रामपुर ऑस्कर थियोडोर लोर
28 मार्च 1824 में जर्मनी में जन्मे ऑस्कर थियोडोर लोर के पिता सर्जन थे। उन्होंने अपने बेटे को मेडिकल की पढ़ाई के लिए पहले जर्मनी के एक कॉलेज में और फिर रशिया भेज दिया। उन्होंने बर्लिन की गॉसनर मिशनरी सोसाइटी ज्वॉइन की। वे पहली बार 1850 में रांची आए।
1857 तक उन्होंने यहां हिंदी सीखी, लोगों का इलाज किया, उनकी सेवा की। 1858 में वे अमेरिका चले गए। 1868 में फिर भारत लौटे। इस बार वे परिवार सहित यहीं बस जाने के लिए आए थे। उन्होंने विश्रामपुर में अपनी सेंट्रल इंडिया की मिशनरी का हेडक्वार्टर बनाया और यहीं रहने लगे।
उनकी पत्नी और दो बेटे भी उनके साथ यहां से ग्रामीणों के इलाज, उन्हें भोजन, शिक्षा, रोजगार मुहैया कराने में जुट गए। फादर लोर की मौत 1907 में कवर्धा में हुई, लेकिन उनका शरीर बाद में विश्रामपुर लाकर दफनाया गया।
धर्म के प्रसार के लिए बाइबिल का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद
फादर लोर और उनके दोनों बेटों ने प्रदेश के दूसरे हिस्सों में तेजी से ईसाई धर्म को फैलाना शुरू किया। जूलियस ने तो यहां के लोगों को ईसाई धर्म से जोड़ने के लिए बाइबिल के एक अध्याय गॉस्पेल ऑफ मार्क्स का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर दिया था।
फादर लोर की मिशनरी ने उस समय कितनी तेजी से छत्तीसगढ़ियों को ईसाई बनाया इसका उदाहरण है कि 1880 में जहां विश्रामपुर में 4 लोगों ने ईसाई धर्म अपनाया था, वहां 1883 आते-आते इनकी संख्या 258 पहुंच गई। 1884 तक विश्रामपुर के अलावा रायपुर, बैतलपुर और परसाभदर में मिशनरी के 3 सेंटर बना दिए गए थे।
इसके साथ ही इन जगहों में 11 स्कूल खोल दिए गए थे। अब तक इन सभी स्थानों पर दूसरे धर्मों से क्रिश्चियन बन चुके लोगों की संख्या 1 हजार 125 हो गई थी। 154 साल पहले विश्रामपुर से शुरू इस मिशनरी की शाखाएं गांव-गांव में हैं और लाखों लोग इससे जुड़े हैं।
ऐसा गांव जहां 100 फीसदी आबादी क्रिश्चियन
विश्रामपुर में प्रवेश के साथ ही आपको दोनों ओर के घरों में क्रॉस या ईसाई समाज के धर्मचिन्ह, स्लोगन लिखे दिखने लगेंगे। जब फादर लोर यहां आए थे तो इस इलाके में सतनामी समाज का वर्चस्व था। उन्होंने यहां के लोगों की मदद करना शुरू किया। वे मेडिकल फील्ड से थे, लिहाजा दवाएं, इलाज, भोजन, शिक्षा और दूसरी सुविधाएं देकर लोगों को प्रभाव में ले लिया।
1870 से उन्होंने धीरे-धीरे लोगों को ईसाई धर्म में शामिल करना शुरू किया। वर्तमान में इस चर्च के सेक्रेटरी दावा करते हैं कि भारत में विश्रामपुर एक ऐसा अनोखा गांव है, जिसकी 100 फीसदी आबादी क्रिश्चियन है। ये उन्हीं लोगों की पीढ़ी है जिन्हें फादर लोर ने क्रिश्चियन बनाया था।
यीशु किसका अवतार था?
अधिकांश ईसाई यीशु को परमेश्वर पुत्र का अवतार मानते हैं और मसीहा , या मसीह , दाऊद की वंशावली के वंशज की प्रतीक्षा करते हैं, जिसकी भविष्यवाणी पुराने नियम में की गई है।
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