National -टीएमसी की रणनीति साफ, चुनाव में फिर ममता बनर्जी बनाम मोदी मुकाबला!

By Anuj Kumar | Updated: February 23, 2026 • 11:59 AM

कोलकाता । बंगाल की सियासी हवा में अब ‘एम’ हावी हो गया है। एम यानी- महिला, मुस्लिम, मस्जिद, मंदिर, मटन, मछली, मनी पॉवर, मसल पॉवर…, ममता और मोदी (Mamta and Modi)। बंगाल की राजनीति यहां के दो सबसे बड़े फुटबॉल क्लबों- मोहन बागान या ईस्ट बंगाल (East Bengal) की तरह दो ध्रुवों में बंटी नजर आती है। पहले यहां कांग्रेस बनाम लेफ्ट की राजनीति थी, फिर 34 साल तक वाम शासन रहा। अब 15 वर्षों से तृणमूल सत्ता में है और पिछले पांच साल से उसका सीधा मुकाबला बीजेपी से है।

‘एम फैक्टर’ के इर्द-गिर्द सिमटी राजनीति

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वाममोर्चा के 34 साल का ‘लाल किला’ भेदकर सीएम बनीं ममता बनर्जी डेढ़ दशक की सत्ता के बाद भी आक्रामक शैली में नजर आ रही हैं। टीएमसी के लिए आज भी ममता का चेहरा, लक्ष्मी भंडार जैसी कल्याणकारी योजनाएं और मुस्लिम वोटों (Muslim Voto) का एकजुट समर्थन जीत का फॉर्मूला माना जा रहा है।

बीजेपी का दांव: मोदी चेहरा और डबल इंजन

वहीं बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे, अनुशासित संगठन और ‘डबल इंजन’ सरकार के नारे के साथ मैदान में है। पार्टी का मानना है कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार विकास की रफ्तार बढ़ा सकती है। हालांकि सड़क पर सीधी टक्कर के लिए उसे अभी भी ऐसे ठोस मुद्दों, सही मौके और प्रभावी स्थानीय चेहरे की तलाश है, जो उसकी विधानसभा सीटें 77 से बढ़ाकर 148 तक पहुंचा सके।

स्थानीय नेतृत्व की चुनौती

राज्य स्तर पर ममता के कद का नेता बीजेपी के पास न होना उसकी बड़ी चुनौती माना जा रहा है। इस बीच, वाममोर्चा और कांग्रेस राज्य में अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। एक वरिष्ठ बंगाली पत्रकार का कहना है कि “यहां जो सड़क जीत लेता है, वही चुनाव जीतता है” और फिलहाल सड़कों पर ममता का दबदबा दिखाई देता है।

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बढ़ता वोट बैंक, लेकिन भरोसे की दरकार

दूसरी ओर, कोलकाता में रेस्टोरेंट चलाने वाले यूपी मूल के एक युवक का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में बीजेपी का वोटर बेस बढ़ा जरूर है, लेकिन पार्टी को मतदाताओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि सरकार बदल सकती है। अगर यह विश्वास बना, तो समर्थन वोट में तब्दील हो सकता है।

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