रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आमंत्रण को स्वीकार करते हुए भारत आने की घोषणा की है। यह यात्रा रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी, जो द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।

द्विपक्षीय संबंधों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत और रूस के बीच संबंध दशकों पुराने हैं, जो मित्रता, सहयोग और आपसी सम्मान पर आधारित हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, जब अमेरिका ने पाकिस्तान की सहायता के लिए अपने नौसैनिक बेड़े को बंगाल की खाड़ी में भेजा था, तब रूस ने भारत के पक्ष में अपने युद्धपोत भेजकर समर्थन दिया था। यह घटना दोनों देशों के बीच गहरे रणनीतिक संबंधों को दर्शाती है।
पुतिन की आगामी यात्रा का महत्व
पुतिन की इस यात्रा से पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2024 में रूस का दौरा किया था, जहां उन्होंने पुतिन को भारत आने का निमंत्रण दिया था। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने पुष्टि की है कि पुतिन ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है, और उनकी यात्रा की तैयारियां चल रही हैं। हालांकि, यात्रा की तिथि अभी घोषित नहीं की गई है।
संभावित एजेंडा और सहयोग क्षेत्र
पुतिन की इस यात्रा के दौरान, दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की संभावना है:
- सैन्य-तकनीकी सहयोग: रक्षा क्षेत्र में भारत और रूस के बीच लंबे समय से सहयोग रहा है। नई रक्षा प्रणालियों की आपूर्ति और संयुक्त उत्पादन पर चर्चा हो सकती है।
- ऊर्जा क्षेत्र: रूस की ऊर्जा कंपनियों के लिए भारत में निवेश के अवसर और दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार बढ़ाने पर विचार-विमर्श संभव है।
मोदी और पुतिन की व्यक्तिगत केमिस्ट्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच व्यक्तिगत संबंध भी भारत-रूस रिश्तों को एक विशेष मजबूती प्रदान करते हैं। दोनों नेताओं ने कई बार व्यक्तिगत मुलाकातें की हैं और महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर एक जैसी राय रखी है। पुतिन ने एक बार मोदी को “एक मजबूत और दूरदर्शी नेता” बताया था। वहीं मोदी ने भी पुतिन को एक सच्चा मित्र कहा है।
पुतिन की भारत यात्रा: संभावनाओं का द्वार
पुतिन की भारत यात्रा एक ऐसे समय पर हो रही है जब वैश्विक राजनीति में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं—जैसे यूक्रेन संकट, चीन की आक्रामक नीतियाँ और पश्चिमी देशों के साथ रूस के तनावपूर्ण संबंध। ऐसे में भारत-पुतिन संवाद द्विपक्षीय ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए भी अहम हो सकता है।
रूस की ‘पिवट टू एशिया’ नीति में भारत की भूमिका
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने एशियाई देशों, विशेषकर भारत और चीन की ओर अपनी नीतियों को मोड़ा है। भारत, रूस के लिए एक बड़ा ऊर्जा बाज़ार, रक्षा साझेदार और राजनीतिक समर्थन देने वाला देश बनकर उभरा है। यह यात्रा रूस की ‘पिवट टू एशिया’ रणनीति में भारत की अहम भूमिका को और गहरा करेगी।
व्यापार और ऊर्जा: नए आयामों की ओर
हाल के वर्षों में भारत और रूस के बीच व्यापारिक संबंधों ने भी रफ्तार पकड़ी है। दोनों देशों का लक्ष्य 2025 तक द्विपक्षीय व्यापार को 30 बिलियन डॉलर तक पहुँचाना है। कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति, उर्वरक व्यापार, कोयला और कृषि उत्पाद जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ हैं। भारत, रूस से रियायती दरों पर तेल खरीद कर अपने ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत कर रहा है।
डिफेंस पार्टनरशिप: भरोसे का दूसरा नाम
रूस, भारत का सबसे पुराना रक्षा भागीदार है। ब्रह्मोस मिसाइल हो या सुखोई-30 लड़ाकू विमान, रूस की तकनीक ने भारतीय सेना को मजबूती दी है। अब दोनों देश नई रक्षा तकनीकों पर संयुक्त निर्माण की दिशा में काम कर रहे हैं। पुतिन की यात्रा के दौरान इस सहयोग को नई दिशा देने की उम्मीद है।
यूक्रेन युद्ध पर भारत की भूमिका
यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की स्थिति संतुलित रही है। भारत ने न तो युद्ध का समर्थन किया और न ही रूस की खुली आलोचना की। इसके बजाय भारत ने शांति की अपील की और मानवीय सहायता भेजी। यह संतुलित रुख रूस को पसंद आया और उसने कई बार भारत के दृष्टिकोण की सराहना की। पुतिन की यात्रा में इस मुद्दे पर भी गहन चर्चा की संभावना है।
शिक्षा, संस्कृति और तकनीक: एक व्यापक संबंध
भारत और रूस के बीच न केवल रणनीतिक बल्कि सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंध भी मज़बूत हो रहे हैं। हर साल सैकड़ों भारतीय छात्र रूस में मेडिकल और तकनीकी शिक्षा के लिए जाते हैं। वहीं रूसी भाषा और संस्कृति को भारत में बढ़ावा देने के लिए संयुक्त कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।