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IPL 2026- मिट्टी से मैदान तक, मंगेश यादव की संघर्ष और सपनों की प्रेरक कहानी

Author Icon By Anuj Kumar
Updated: March 28, 2026 • 2:38 PM
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नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के छोटे से गांव बोरगांव से निकलकर रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (Royal Challengers Bangalore) तक पहुंचने वाले मंगेश यादव का सफर सिर्फ 5.2 करोड़ रुपये की बोली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक परिवार के संघर्ष, त्याग और अटूट विश्वास की कहानी है।

पिता के संघर्ष ने गढ़ा सपना

मंगेश के पिता रामावध यादव (Ramavadh Yadav) ट्रक ड्राइवर रहे हैं, जिनकी जिंदगी लगातार संघर्षों से भरी रही। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने बेटे की ट्रेनिंग कभी नहीं रुकने दी, चाहे इसके लिए उन्हें उधार ही क्यों न लेना पड़ा हो।कई रातें उन्होंने इस चिंता में बिताईं कि अगली फीस कहां से आएगी, लेकिन बेटे के हौसले को टूटने नहीं दिया।

दिल्ली में संघर्ष, कोच का मिला सहारा

मंगेश की प्रतिभा को पहली पहचान तब मिली जब उनके चाचा ने उन्हें दिल्ली भेजने की सलाह दी। पिता ने 24,000 रुपये जुटाकर उन्हें कोच फूलचंद शर्मा (Phulchand Sharma) के पास भेजा। दिल्ली में शुरुआती दिन बेहद कठिन रहे—न रहने की जगह और न ही खाने का ठिकाना। लेकिन कोच ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें सहारा दिया और यहीं से उनके करियर को नई दिशा मिली।

अनुशासन की गलती बनी टर्निंग पॉइंट

इस सफर में एक समय ऐसा भी आया जब मंगेश अनुशासन से भटक गए। तब उनके कोच ने सख्ती दिखाते हुए उन्हें घर लौटने तक की चेतावनी दी। यह झटका उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ और उन्होंने खुद को संभालते हुए पूरी मेहनत के साथ क्रिकेट पर फोकस किया।

घरेलू क्रिकेट से मिली पहचान

डीडीसीए लीग से लेकर यूपी अंडर-19 कैंप तक मंगेश ने लगातार मेहनत की, हालांकि कई बार चयन न होने की निराशा भी झेलनी पड़ी। उनकी मेहनत का असली फल ‘मध्य प्रदेश टी20 लीग’ में मिला, जहां उन्होंने 6 मैचों में 14 विकेट लेकर सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा।

RCB ट्रायल में चमके, करोड़ों में लगी बोली

इसके बाद उन्हें आरसीबी ट्रायल के लिए बुलाया गया, जहां दिनेश कार्तिक ने उनकी प्रतिभा को परखा। मंगेश ने हर स्थिति में खुद को साबित किया और अंततः 5.2 करोड़ रुपये में टीम ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया।

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पिता के चेहरे की मुस्कान बनी सबसे बड़ी जीत

आज मंगेश की सफलता उनके पिता के संघर्ष का सम्मान है। जो लोग कभी उनके सपनों का मजाक उड़ाते थे, वही अब उनकी सराहना कर रहे हैं। मंगेश के लिए सबसे बड़ी जीत पैसा नहीं, बल्कि अपने पिता के चेहरे पर गर्व की मुस्कान है, जिसने इस पूरे सफर को सार्थक बना दिया।

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