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Hyderabad : मत्स्य सहकारी समितियों पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला, तैयार किया जाएगा रोडमैप

Author Icon By Ajay Kumar Shukla
Updated: May 15, 2026 • 6:17 AM
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हैदराबाद। मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के मत्स्य विभाग (Fisheries Department) के अंतर्गत राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी) 15 मई को हैदराबाद में मत्स्य सहकारी समितियों पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन करेगा, जिसमें देश भर से नीति निर्माता, वित्तीय संस्थान, सहकारी नेता और मत्स्य विशेषज्ञ एक साथ आएंगे। इस कार्यशाला का उद्देश्य मत्स्य पालन सहकारी समितियों को मजबूत करना और मत्स्य पालन क्षेत्र में समावेशी विकास को बढ़ावा देना है, जो लगभग 3 करोड़ लोगों की आजीविका (Livelihood) का समर्थन करता है और लगभग 9 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ भारत के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक के रूप में उभरा है।

6,000 नई मत्स्य सहकारी समितियों की स्थापना

मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी, सहकारिता मंत्रालय के सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी, एनएफडीबी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. बिजय कुमार बेहरा और तेलंगाना के कृषि एवं सहकारिता सचिव के. सुरेंद्र मोहन सहित वरिष्ठ अधिकारी सभा को संबोधित करेंगे। कार्यशाला का मुख्य केंद्रबिंदु प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसवाई) योजनाओं के तहत 2024-25 और 2028-29 के बीच 6,000 नई मत्स्य सहकारी समितियों की स्थापना और 5,500 मौजूदा समितियों को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित कार्य योजना होगी।

नई सहकारी समितियों का गठन

विचार-विमर्श में नई सहकारी समितियों का गठन, मौजूदा समितियों को मजबूत करना, ऋण संपर्क, समुद्री मत्स्य पालन में विविधीकरण, डिजिटल मार्केटिंग प्लेटफॉर्म और अंतर्देशीय, हिमालयी और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में अवसरों को शामिल किया जाएगा। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ नाबार्ड, एनसीडीसी, नाफेड, एसएफएसी, एनडीडीबी, आईसीएआर-सीएमएफआरआई और आईसीएआर-सीआईएफटी जैसे संगठनों के प्रतिनिधियों के भाग लेने की उम्मीद है। यह कार्यशाला “सहकार से समृद्धि” की परिकल्पना के अनुरूप है और इसका उद्देश्य सहकारी आंदोलन का विस्तार करते हुए भारत की नीली अर्थव्यवस्था के विकास को गति देना है।

नीली अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?

समुद्र, नदियों और अन्य जल संसाधनों का संतुलित और टिकाऊ उपयोग करके आर्थिक विकास करना नीली अर्थव्यवस्था कहलाता है। इसमें मत्स्य पालन, समुद्री व्यापार, पर्यटन, बंदरगाह, समुद्री ऊर्जा और जैव संसाधनों का उपयोग शामिल होता है। इसका उद्देश्य आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व देना है। समुद्री संसाधनों का सही उपयोग रोजगार और व्यापार बढ़ाने में मदद करता है। जल संसाधनों की सुरक्षा और सतत विकास के लिए इस अवधारणा को आधुनिक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण माना जाता है।

भारत की नीली अर्थव्यवस्था क्या है?

देश की समुद्री और तटीय संपदा का उपयोग करके आर्थिक विकास बढ़ाने की नीति को भारत की नीली अर्थव्यवस्था कहा जाता है। इसमें बंदरगाह विकास, समुद्री व्यापार, मत्स्य पालन, तटीय पर्यटन और समुद्री ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। लंबी समुद्री तटरेखा होने के कारण भारत के लिए यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। रोजगार सृजन, निर्यात बढ़ाने और ऊर्जा संसाधनों के विकास में इसकी बड़ी भूमिका देखी जाती है। सरकार समुद्री संसाधनों के टिकाऊ उपयोग और पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रही है।

नीली अर्थव्यवस्था क्या है?

यह ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें समुद्र और जल संसाधनों का उपयोग पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हुए किया जाता है। मत्स्य उद्योग, समुद्री परिवहन, जहाज निर्माण, तटीय पर्यटन और समुद्री खनिज इसके प्रमुख हिस्से माने जाते हैं। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाए बिना आर्थिक लाभ प्राप्त करना है। जलवायु परिवर्तन और समुद्री प्रदूषण जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सतत विकास पर जोर दिया जाता है। कई देश अपनी आर्थिक प्रगति के लिए इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहे हैं।

नीली अर्थव्यवस्था का क्या महत्व है?

रोजगार, व्यापार और ऊर्जा संसाधनों के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। समुद्री व्यापार और बंदरगाह गतिविधियों से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। मत्स्य पालन और तटीय पर्यटन लाखों लोगों की आजीविका से जुड़े हुए हैं। पर्यावरण संरक्षण और जल संसाधनों के संतुलित उपयोग के कारण यह सतत विकास के लिए भी जरूरी माना जाता है। समुद्री जैव विविधता की रक्षा और नए आर्थिक अवसर पैदा करने में इसका बड़ा योगदान देखा जाता है।

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