वोंटिमिट्टा। श्री कोडंदरामा स्वामी के वार्षिक ब्रह्मोत्सव (Annual Brahmotsavam) शनिवार को भव्य रूप से संपन्न हुए। मंदिर के पुष्करिणी टैंक में पवित्र चक्रस्नान किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में भक्तों ने पवित्र स्नान किया। सवेरे 4 बजे सुप्रभातम् से दिन की शुरुआत हुई, इसके बाद मंदिर शुद्धिकरण और पूजा हुई। 9:30 बजे श्री राम, सीता और लक्ष्मण की उत्सव मूर्तियों की रथयात्रा हुई, जबकि सुदर्शन चक्रत्तल्वर को पालकी में पुष्करिणी (Lotus Pond) ले जाया गया। 10:30 से 11:15 बजे तक स्नापन तिरुमंज़नम के दौरान मूर्तियों को दूध, दही, शहद, हल्दी और चंदन से स्नान कराया गया। इसके बाद वेदिक मंत्रोच्चारण के बीच चक्रस्नान संपन्न हुआ। ब्रह्मोत्सव की समाप्ति आज रात 7:00 बजे ध्वजारोहण के साथ होगी। श्री कोडंदरामा स्वामी का पुष्पयागम रविवार, 5 अप्रैल को शाम 6:00 बजे से 9:00 बजे तक मंदिर में भव्य रूप से मनाया जाएगा।
ब्रह्मोत्सव क्या है?
एक प्रमुख हिंदू धार्मिक उत्सव है, जिसे भगवान विष्णु के अवतार भगवान वेंकटेश्वर की पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह उत्सव बड़े भव्य तरीके से आयोजित होता है, जिसमें भगवान की विशेष पूजा, रथ यात्रा और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। यह उत्सव भक्ति, परंपरा और आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।
ब्रह्मोत्सव कहां मनाया जाता है?
यह उत्सव मुख्य रूप से तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर में मनाया जाता है, जो तिरुपति के पास स्थित है। इसके अलावा भारत के कुछ अन्य विष्णु मंदिरों में भी ब्रह्मोत्सव आयोजित होता है, लेकिन तिरुमला का ब्रह्मोत्सव सबसे प्रसिद्ध और भव्य माना जाता है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
तिरुपति तिरुमाला ब्रह्मोत्सवम कितने दिनों के लिए आयोजित किया जाता है?
ब्रह्मोत्सवम आमतौर पर 9 दिनों तक चलता है। इस दौरान प्रतिदिन अलग-अलग प्रकार की वाहन सेवाएं (वहनम) निकाली जाती हैं, जिनमें भगवान वेंकटेश्वर की मूर्ति को विभिन्न वाहनों पर सजाकर शोभायात्रा निकाली जाती है। हर दिन का विशेष धार्मिक महत्व होता है और भक्त बड़ी श्रद्धा से इसमें भाग लेते हैं।
ब्रह्मोत्सवम के पीछे क्या कहानी है?
मान्यता के अनुसार इस उत्सव की शुरुआत स्वयं ब्रह्मा ने की थी, इसलिए इसे ब्रह्मोत्सव कहा जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने भगवान वेंकटेश्वर की आराधना के लिए इस उत्सव का आयोजन किया था। तब से यह परंपरा चली आ रही है। यह कथा भक्तों में आस्था और श्रद्धा को बढ़ाती है और इस उत्सव को विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करती है।
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