बेकरियों में ‘दम के रोट’ बनाना एक पुरानी परंपरा
हैदराबाद। जी हां, मुहर्रम (Muharram) का महीना चल रहा है और ‘दम के रोट’ का समय आ गया है, ड्राई फ्रूट्स से बनी कुकीज़ जो शहर की बेकरियों में इस महीने के दौरान बनाई और बेची जाती हैं। मुहर्रम के महीने में शहर की बेकरियों में ‘दम के रोट’ बनाना एक पुरानी परंपरा (tradition) है। समय के साथ, कुछ बेकर्स ने इसे पूरे वर्ष उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है, लेकिन अधिकांश बेकर्स इसे पारंपरिक प्रथा के रूप में केवल मुहर्रम माह के दौरान ही तैयार करते हैं, हालांकि इस कुकी का कोई धार्मिक महत्व नहीं है।
पूरी तरह से शाकाहारी
यह कुकी गेहूं के आटे, सूजी, वनस्पति तेल, चीनी, शहद, घी, नमक, इलायची और दूध से बने उत्पादों से बनाई जाती है। नामपल्ली में सुभान बेकरी के सैयद इरफान कहते हैं, ‘यह पूरी तरह से शाकाहारी है। हम इसे बनाने के लिए अंडे का इस्तेमाल नहीं करते हैं।’ किंवदंती के अनुसार, सातवें निजाम मीर उस्मान अली खान ने एक बार अपने पोते मुकर्रम जाह बहादुर की सुरक्षा और भलाई के लिए चारमीनार के पास नाला-ए-मुबारक आलम पर रोट चढ़ाया था।
घरों में रोट बनाने का चलन खत्म
यह प्रथा आज भी जारी है, और जो लोग अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए मन्नत मांगते हैं, वे अलम पर रोट तोड़ते हैं और इसे दूसरों में बांटते हैं। पहले, ज़्यादातर परिवार घर पर ही आटा तैयार करते थे और इसे ओवन में पकाने के लिए पास की बेकरी में ले जाते थे। इतिहासकार मोहम्मद सफीउल्लाह कहते हैं, ‘व्यस्त जीवनशैली के कारण घरों में रोट बनाने का चलन खत्म हो गया था। इसे देखते हुए, बेकर्स ने इसे बनाना और बेचना शुरू कर दिया।’
दसवीं मुहर्रम को मांग सबसे ज़्यादा
बेकवेल केक हाउस के सैयद मकबूल बताते हैं, ‘बेकिंग में समय, तापमान और सामग्री के बीच एक बढ़िया संतुलन शामिल होता है। बेकिंग की अवधि ही इसे भूरा रंग देती है, साथ ही इसे कुरकुरा और मुलायम बनाती है।’ दसवीं मुहर्रम को मांग सबसे ज़्यादा होती है, जो ‘यौम-ए-आशूरा’ के तौर पर मनाया जाता है। पिस्ता हाउस के अब्दुल मजीद कहते हैं, ‘हमारे सभी आउटलेट पर कतारें लगी हुई हैं। लोग ऑनलाइन ऑर्डर भी दे रहे हैं।’ रोट शहर के अन्य स्थानों के अलावा अल्फा बेकरी – सिकंदराबाद, रोज बेकरी – चदरघाट और कराची बेकरी पर भी उपलब्ध है।
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