हैदराबाद। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी, सीआरपीएफ और ज्योति रेड्डी फाउंडेशन के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर करने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) परिसर में एक विशेष अध्ययन केंद्र स्थापित करेगी। विश्वविद्यालय के ‘शिक्षा सप्ताह’ समारोह के दौरान सोमवार को हैदराबाद परिसर में कुलपति प्रोफेसर घंटा चक्रपाणि की उपस्थिति में समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए।
इस अवसर पर बोलते हुए, प्रोफेसर चक्रपाणि ने विश्वविद्यालय की समान अवसर योजना के तहत युद्ध विधवाओं और आदिवासी समुदायों, जिनमें गोंड, कोया और चेंचु जनजातियों के बच्चे भी शामिल हैं, के लिए मुफ्त शिक्षा पहलों की घोषणा की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय (University) समावेशी शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और कैदियों और सैन्य कर्मियों को पहले से ही मुफ्त शिक्षा प्रदान कर रहा है। उन्होंने हाशिए पर पड़े समुदायों का समर्थन करने और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ज्योति रेड्डी फाउंडेशन की भी प्रशंसा की।
बाबा साहब का इतिहास क्या है?
B. R. Ambedkar का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। वे महान समाज सुधारक, विधिवेत्ता और भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता माने जाते हैं। उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने विदेशों में भी अध्ययन किया था। स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में भी उन्होंने कार्य किया। सामाजिक समानता, शिक्षा और मानव अधिकारों के लिए उनका योगदान भारतीय इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
डॉ बी आर अंबेडकर को कितने देशों में माना जाता है?
दुनियाभर के कई देशों में उनके विचारों और सामाजिक न्याय के संघर्ष को सम्मान दिया जाता है। भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, नेपाल और अन्य देशों में भी उनके नाम पर कार्यक्रम, शोध और स्मारक मौजूद हैं। विशेष रूप से मानव अधिकार, समानता और संविधान से जुड़े विषयों में उनके योगदान का अध्ययन किया जाता है। हालांकि आधिकारिक रूप से यह तय संख्या नहीं है कि कितने देश उन्हें मानते हैं। सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के समर्थकों के बीच उनकी पहचान वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली मानी जाती है।
देश को डॉक्टर अंबेडकर की सबसे बड़ी देन क्या है?
भारतीय संविधान का निर्माण उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाता है। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों को मजबूत आधार दिया। सभी नागरिकों को समान अधिकार दिलाने और भेदभाव खत्म करने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। शिक्षा, सामाजिक सुधार और दलित अधिकारों के लिए भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक ढांचे को मजबूत बनाने में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाता है।
बाबा साहब ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा था?
सामाजिक भेदभाव और जातिगत असमानता के विरोध में उन्होंने यह निर्णय लिया था। उनका मानना था कि समाज में बराबरी और सम्मान मिलना जरूरी है। लंबे समय तक सामाजिक सुधार के प्रयासों के बाद भी जब उन्हें अपेक्षित बदलाव नहीं दिखा, तब उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला किया। वर्ष 1956 में नागपुर में लाखों समर्थकों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। समानता, मानवता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के कारण उन्होंने इस मार्ग को चुना और लोगों को शिक्षा तथा अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
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