बीसी आयोग कार्यालय में महात्मा गांधी को पुष्पांजलि अर्पित
हैदराबाद। खैरताबाद स्थित तेलंगाना पिछड़ा वर्ग (BC) आयोग कार्यालय में महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर महात्मा गांधी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई तथा इसके उपरांत दो मिनट का मौन रखा गया। इस अवसर पर आयोग के अध्यक्ष जी. निरंजन (G. Niranjan) ने अपने संबोधन में कहा कि महात्मा गांधी की शिक्षाएं आज की पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब पूरा विश्व तनावपूर्ण वातावरण का सामना कर रहा है, ऐसे में देशों के बीच सद्भावना और भाईचारे की स्थापना के लिए गांधीजी का शांति मार्ग ही एकमात्र रास्ता है। कार्यक्रम में आयोग के सदस्य रापोलु जयप्रकाश, तिरुमलागिरी सुरेंदर, सहायक सचिव मनोज, उप निदेशक श्रीनिवास, विशेष अधिकारी सुनीता, अनुभाग अधिकारी सतीश कुमार तथा कार्यालय के अन्य कर्मचारी उपस्थित रहे।
महात्मा गांधी का पूरा इतिहास क्या है?
संक्षेप में महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ। उन्होंने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया। दक्षिण अफ्रीका से संघर्ष की शुरुआत कर भारत में असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन के माध्यम से आज़ादी की नींव रखी। ऐतिहासिक तथ्य अनुसार महात्मा गांधी की केवल एक ही पत्नी थीं। उनका विवाह कस्तूरबा गांधी से हुआ था। कस्तूरबा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और अनेक आंदोलनों में भाग लिया। वे गांधीजी के जीवन, विचार और संघर्ष की महत्वपूर्ण साथी रहीं।
गांधी जी के अंतिम शब्द क्या थे?
विभिन्न स्रोतों के अनुसार महात्मा गांधी के अंतिम शब्द “हे राम” थे। 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारे जाने के समय उनके मुख से यह शब्द निकले, ऐसा व्यापक रूप से माना जाता है, हालांकि कुछ इतिहासकारों में इस पर मतभेद भी मिलता है।
नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को क्यों मारा?
इतिहासकारों के अनुसार नाथूराम गोडसे महात्मा गांधी की नीतियों से असहमत था। उसका मानना था कि गांधी विभाजन के बाद पाकिस्तान के प्रति अत्यधिक नरम रुख अपना रहे हैं और इससे भारत के हित प्रभावित हो रहे हैं। इसी वैचारिक कट्टरता और असंतोष के कारण उसने 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या की।
गांधी जी के अंतिम शब्द क्या थे?
इतिहास के अनुसार महात्मा गांधी के अंतिम शब्द “हे राम” थे। 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारने के समय उन्होंने यह शब्द कहे। इसे गांधी जी की भक्ति, शांति और अपने जीवन के मूल सिद्धांतों का प्रतीक माना जाता है।
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