CM : मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ एकता जरूरी – मुख्यमंत्री

By Ajay Kumar Shukla | Updated: January 18, 2026 • 10:51 PM

हैदराबाद। मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी (Chief Minister A. Revanth Reddy) ने रविवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लड़ाई के लिए सभी लोकतांत्रिक ताकतों की एकता जरूरी है। उन्होंने भाजपा को अंग्रेजों से भी अधिक खतरनाक बताते हुए कहा कि आज देश के नागरिकों के अधिकारों को कुचला जा रहा है। खम्मम में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के शताब्दी समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस और सीपीआई दोनों दलों का सौ वर्षों का संघर्षपूर्ण इतिहास है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर किसानों और मजदूरों के अधिकारों तक, दोनों दलों की भूमिका ऐतिहासिक रही है।

“जमीन जोतने वाले की” नीति के तहत भूमिहीन किसानों को दिलाई भूमि

मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने “जमीन जोतने वाले की” नीति के तहत भूमिहीन किसानों को भूमि दिलाई। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट आंदोलन के संघर्षों के कारण ही किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य और बिचौलिया प्रथा से मुक्ति जैसे अधिकार मिले। रेवंत रेड्डी ने दावा किया कि खम्मम जिले में भाजपा का कोई अस्तित्व नहीं है। उन्होंने कांग्रेस और वाम दलों के कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ संघर्ष तेज करें और राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए एकजुट होकर काम करें। मुख्यमंत्री ने अंत में कार्यक्रम आयोजकों का आभार व्यक्त किया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कब और किसने की थी?

वर्ष 1925 में कानपुर में एक सम्मेलन के दौरान इस दल की नींव रखी गई थी। इसकी स्थापना में एम. एन. रॉय, एस. ए. डांगे, मुज़फ्फर अहमद और अन्य वामपंथी विचारकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिनका उद्देश्य श्रमिकों और किसानों के अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष करना था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कब और क्यों दो भागों में विभाजित हुई?

1964 में वैचारिक मतभेदों के कारण यह दल दो हिस्सों में बंट गया। एक गुट सोवियत संघ समर्थक रुख के साथ रहा, जबकि दूसरा गुट चीन के विचारों से अधिक प्रभावित था। इसी विभाजन से सीपीआई और सीपीआई (एम) अस्तित्व में आए।

1952 के आम चुनावों में दूसरे नंबर पर रहने वाली राजनीतिक पार्टी कौन सी थी?

स्वतंत्रता के बाद हुए पहले आम चुनाव में कांग्रेस के बाद सबसे अधिक सीटें इसी वामपंथी दल को मिली थीं। उस समय यह पार्टी संसद में सबसे बड़ा विपक्ष बनकर उभरी और राष्ट्रीय राजनीति में एक मजबूत वैचारिक विकल्प के रूप में स्थापित हुई।

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