वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति और न्यायपालिका के बीच टैरिफ को लेकर चल रहा टकराव अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में (Supreme Court of the United States) द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति के खिलाफ दिए गए फैसले ने व्हाइट हाउस की आर्थिक रणनीति को बड़ा झटका दिया है। इसके बाद राष्ट्रपति ने अदालत के प्रति अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वे दुनिया के किसी भी देश को बर्बाद करने की ताकत रखते हैं। कोर्ट ने राष्ट्रपति द्वारा अप्रैल में लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ को 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत अवैध करार दिया है। इस फैसले का सीधा अर्थ है कि राष्ट्रपति इस विशेष कानून का उपयोग करके दूसरे देशों पर मनमाने ढंग से आयात शुल्क नहीं थोप सकते।
कोर्ट के फैसले पर ट्रंप का तीखा रुख
न्यायिक आदेश के तुरंत बाद मीडिया (Media) से बात करते हुए ट्रंप ने अदालत के रुख को “शर्मनाक” बताया। उन्होंने कहा कि एक राष्ट्रपति के रूप में उनके पास किसी भी देश के साथ व्यापार पूरी तरह बंद करने या एंबार्गो लगाने की शक्ति है, लेकिन अदालत उन्हें एक डॉलर का टैरिफ लगाने से भी रोक रही है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका का यह फैसला अमेरिकी हितों के बजाय विदेशी ताकतों को लाभ पहुंचाने वाला प्रतीत होता है। उन्होंने दावा किया कि उनके पिछले टैरिफ कदमों से अमेरिकी खजाने में सैकड़ों अरब डॉलर की आय हुई है और वे अपनी आर्थिक नीति को रुकने नहीं देंगे।
वैकल्पिक कानूनी रास्ते से पलटवार
कानूनी झटके के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रंप ने ओवल ऑफिस (Oval Office) से एक नई घोषणा कर दी। उन्होंने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत 10 प्रतिशत का नया ग्लोबल टैरिफ लागू करने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। यह प्रावधान राष्ट्रपति को अधिकतम 150 दिनों के लिए 15 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की अनुमति देता है, लेकिन इसे आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक होगी। इससे साफ है कि ट्रंप अदालत के आदेश के बावजूद वैकल्पिक कानूनी रास्तों से अपनी टैरिफ नीति जारी रखने के पक्ष में हैं।
वैश्विक व्यापार पर असर
व्हाइट हाउस अधिकारियों के अनुसार, जिन देशों के साथ अमेरिका के व्यापार समझौते पहले से हैं, उन पर फिलहाल 10 प्रतिशत का टैरिफ लागू रहेगा, जब तक नई दरों पर अंतिम सहमति नहीं बनती। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया टैरिफ भी भविष्य में अदालती चुनौती का सामना कर सकता है। हालांकि, इसकी 150 दिनों की समय सीमा के कारण संभव है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही इसकी अवधि समाप्त हो जाए। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के बीच यह अधिकारों की खींचतान न केवल अमेरिकी राजनीति को गरमा रही है, बल्कि वैश्विक व्यापार जगत में भी अनिश्चितता का माहौल पैदा कर रही है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिकी कांग्रेस इस नीति को स्थायी समर्थन देती है या यह टकराव और गहराता है।
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