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Dalai Lama : दलाई लामा कौन हैं? क्या है इनका महत्व

Surekha Bhosle
Surekha Bhosle
Dalai Lama : दलाई लामा कौन हैं? क्या है इनका महत्व

1.1 नाम का अर्थ

  • दलाई’ एक मंगोलियाई शब्द है जिसका अर्थ है “महासागर” और ‘लामा’ तिब्बती शब्द है जिसका अर्थ है “गुरु”।
  • इस प्रकार “दलाई लामा” का अर्थ होता है – “बुद्धिमत्ता का महासागर”।

1.2 परंपरा और पद

दलाई लामा (Dalai Lama) को बौद्ध धर्म (Buddhism) के गेलुग परंपरा (Gelug School) का प्रमुख माना जाता है। वर्तमान (14वें) दलाई लामा – तेनज़िन ग्यात्सो, 1935 में जन्मे और 1940 में उन्हें दलाई लामा के रूप में मान्यता दी गई।

तिब्बत की धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के प्रतीक दलाई लामा की दुनियाभर में अलग पहचान है. दलाई लामा आज 90 साल के हो चुके हैं. तिब्बत में अब तक 14 दलाई लामा हो चुके हैं. 14वें दलाई लामा का असली नाम तेनजिन ग्यात्सो है. उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को ताकस्तेर, उत्तर-पूर्वी तिब्बत में हुआ था।

तेनजिन ग्यात्सो ने बौद्ध दर्शन में पीएचडी की है. साल 1940 से चौदहवां’दलाई लामा’ बनाया गया था. इसके बाद वे 1959 में भारत आ गए थे. तब से वे भारत में ही रह रहे हैं. अब तक वे 65 से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं, इसके साथ ही उन्हें 85 से ज्यादा सम्मान पुरस्कार मिल चुके हैं. इसके साथ ही वे 70 से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं. इस समय वे हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हैं।

‘दलाई लामा’ का क्या महत्व है?

दलाई लामा Dalai Lama तिब्बती बौद्धों के सबसे बड़े धर्मगुरु होते हैं. तिब्बती बौद्धों के निर्विवाद सर्वोच्च नेता माना जाता है. तिब्बत की पहचान और स्वायत्तता के प्रतीक दलाई लामा के तौर पर ही होती है. उन्हें बोधिसत्व ‘अवलोकितेश्वर’ के अवतार माना जाता है. ये तिब्बती बौद्ध धर्म में सर्वोच्च उपाधि है. दलाई लामा का अर्थ ‘ज्ञान का महासागर’ होता है, उन्हें सम्मान से ‘परम पावन’ कहा जाता है. तिब्बती बौद्धों की 700 वर्ष पुरानी परंपरा है।

मौजूदा दलाई लामा को कैसे चुना गया?

6 जुलाई, 1935 को तिब्बत के किसान परिवार में जन्मे 14वें दलाई लामा की पहचान पुनर्जन्म के रूप में हुई. 2 साल की उम्र में अगले ‘दलाई लामा’ के रूप में पहचाना गया. इसके पहले के 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म बताए गए हैं. तिब्बत सरकार ने कई टीमों को उत्तराधिकारी की खोज में भेजा था. 4 साल खोज के बाद ल्हामो धोंडुप नामक बालक की पहचान गई।

उत्तराधिकारी होने के संकेत मिले तो परीक्षा ली गई. पूर्व दलाई लामा की चीजों को देखकर कहा- ”ये मेरी हैं” 1940 में ल्हासा के पैलेस में जाने के बाद सर्वोच्च धर्मगुरु बनाया गया।

कैसे चुने जाते हैं उत्तराधिकारी?

‘दलाई लामा’ Dalai Lama का चयन पुनर्जन्म के सिद्धांत पर आधारित है. वरिष्ठ लामाओं की तरफ से अगले दलाई लामा की खोज की जाती है. संकेतों, सपनों, भविष्यवाणियों के माध्यम से खोज की जाती है. इस चयन प्रक्रिया में कई बार कई साल लग जाते हैं. एक से ज्यादा बच्चों में भी लक्षण दिख सकते हैं. संभावित बच्चा मिलने के बाद परीक्षा भी ली जाती है. पूर्व दलाई लामा की माला या छड़ी की पहचान कराई जाती है. दलाई लामा बनने से पहले कई साल गहरा अध्ययन करना पड़ता है. बौद्ध धर्म-दर्शन और तिब्बती संस्कृति की गहरी शिक्षा दी जाती है।

कैसे चुने जाते हैं दलाई लामा के उत्तराधिकारी?

तिब्बती बौद्ध परंपरा में दलाई लामा का चयन पुनर्जन्म के सिद्धांत पर आधारित है. मान्यताओं के अनुसार, वर्तमान दलाई लामा के देहांत के बाद उनकी आत्मा एक नवजात शिशु में पुनर्जन्म लेती है. पिछले दलाई लामा के निधन के बाद एक शोक का समय होता है. इसके बाद अगले दलाई लामा की खोज वरिष्ठ लामाओं द्वारा संकेतों, सपनों, और भविष्यवाणियों के माध्यम से होती है।

दलाई लामा के अंतिम संस्कार के दौरान उनकी चिता से निकलने वाले धुएं की दिशा, मृत्यु के समय वे जिस दिशा में देख रहे थे वो स्थिति भी अगले दलाई लामा की खोज में मददगार होती है।

इस प्रक्रिया में कई बार साल लग जाते हैं. एक से ज्यादा बच्चों में भी मौजूदा लामा के बताए हुए लक्षण दिख सकते हैं. हालांकि, संभावित बच्चे के मिलने के बाद उसकी पुनर्जन्म के तौर पर पहचान करने के लिए उसे पूर्ववर्ती दलाई लामा की वस्तुओं, जैसे माला या छड़ी को पहचानने की परीक्षा ली जाती है. अगर संभावित बच्चा इसमें सफल रहता है तो उसे बौद्ध धर्म, तिब्बती संस्कृति, और दर्शन की गहन शिक्षा दी जाती है।

अब तक जितने भी दलाई लामा हुए, उनमें से सिर्फ एक का जन्म मंगोलिया में हुआ और एक का जन्म पूर्वोत्तर भारत में हुआ था. इसके अलावा बाकी दलाई लामा को तिब्बत में ही ढूंढा गया था।

‘दलाई लामा’ की परंपरा कैसे शुरू हुई?

‘दलाई लामा’ उपाधि पहली बार 1578 में दी गई थी. मंगोल शासक अल्तान खान ने सबसे पहले सोनम ग्यात्सो को उपाधि दी थी. सोनम ग्यात्सो को तीसरा ‘दलाई लामा’ माना गया. तिब्बती बौद्धों के पूर्ववर्ती दो धर्मगुरुओं को भी उपाधि मिली. 17वीं सदी में पांचवें दलाई लामा ने तिब्बत में सत्ता स्थापित की थी. तिब्बत में ‘दलाई लामा’ की सत्ता 1951 तक रही है।

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