90.56 पर फिसला भारतीय रुपया
नई दिल्ली: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया एक बार फिर दबाव में आ गया है और बाजार में चिंता का माहौल बन गया है। नई दिल्ली(New Delhi) में शुक्रवार को कारोबार के दौरान रुपया 90.56 के रिकॉर्ड इंट्राडे निचले स्तर तक पहुंच गया। दिन के अंत में यह 90.49 पर बंद हुआ, जो पिछले बंद भाव से साफ गिरावट दर्शाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और भारत-अमेरिका(India-America) व्यापार समझौते में हो रही देरी है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का भरोसा फिलहाल कमजोर दिख रहा है। दिसंबर महीने में अब तक हजारों करोड़ रुपये की निकासी हो चुकी है, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। डॉलर इंडेक्स के कमजोर होने के बावजूद रुपये का फिसलना इस बात की ओर इशारा करता है कि समस्या वैश्विक नहीं, बल्कि घरेलू अनिश्चितताओं से जुड़ी है।
व्यापार समझौते से जुड़ी उम्मीदें
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में व्यापार समझौते को लेकर दो दिन की बातचीत पूरी हुई है। दोनों पक्षों ने आपसी हितों और द्विपक्षीय व्यापार को आगे बढ़ाने के मुद्दों पर चर्चा की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत से संकेत मिला कि समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिशें जारी हैं।
बाजार को उम्मीद थी कि टैरिफ में कटौती और बाजार तक बेहतर पहुंच को लेकर कोई ठोस संकेत मिलेगा। लेकिन किसी स्पष्ट घोषणा के अभाव में निवेशकों की भावना पर असर पड़ा है। यही कारण है कि कमजोर वैश्विक डॉलर के बावजूद रुपया संभल नहीं पा रहा है।
निवेशकों की बेचैनी बढ़ी
विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में रुपये की कमजोरी भारत-विशिष्ट अनिश्चितताओं को दर्शाती है। फेडरल रिजर्व की नीति और कमजोर अमेरिकी आंकड़ों के कारण डॉलर इंडेक्स में गिरावट आई है, फिर भी भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। इससे साफ है कि निवेशक व्यापार समझौते को लेकर स्पष्टता चाहते हैं।
अगर टैरिफ लाइनों पर सहमति बनती है और सप्लाई चेन में सुधार होता है, तो रुपये में मजबूती देखने को मिल सकती है। बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए भी यह राहत भरा संकेत होगा, क्योंकि इससे निवेश और आय में सुधार की उम्मीद बनेगी।
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समझौता कमजोर रहा तो असर
हालांकि, महीनों की बातचीत के बाद भी ठोस नतीजे न निकलने से जोखिम बढ़ गया है। यदि समझौता उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो विदेशी निवेशकों की निकासी और तेज हो सकती है। इससे शेयर बाजार के साथ-साथ रुपये पर भी लंबा दबाव बना रह सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्पष्टता की कमी जोखिम भावना को कमजोर रखेगी। ऐसी स्थिति में डॉलर के मुकाबले रुपया ऊंचे स्तरों पर बना रह सकता है और नई ऊंचाइयों का परीक्षण भी कर सकता है।
रुपये की गिरावट का मुख्य कारण क्या है
रुपये की कमजोरी का प्रमुख कारण विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता है। बाजार को टैरिफ और व्यापार शर्तों पर स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। इससे निवेशकों का भरोसा डगमगाया है।
आगे रुपये का रुख किस दिशा में रहेगा
विशेषज्ञों के अनुसार, निकट अवधि में रुपये पर दबाव बना रह सकता है। अगर वैश्विक जोखिम भावना सुधरती है और व्यापार वार्ता से सकारात्मक संकेत मिलते हैं, तो रुपया कुछ मजबूती दिखा सकता है। अन्यथा इसके और कमजोर होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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