डॉलर के मुकाबले ₹92 के करीब पहुंची कीमत, आयात होगा महंगा
नई दिल्ली: भारतीय रुपया(Rupee) शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 को अपने ऐतिहासिक सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार(International Market) में डॉलर की बढ़ती मांग और भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की भारी निकासी ने रुपये की कमर तोड़ दी है। दिन के कारोबार के दौरान रुपया 91.99 प्रति डॉलर के स्तर को छू गया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है।
गिरावट की वजह: विदेशी निवेशकों की विदाई और ग्लोबल तनाव
रुपये(Rupee) में इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली है। जनवरी 2026 के शुरुआती 22 दिनों में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से लगभग ₹36,500 करोड़ निकाल लिए हैं। इसके साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीतियों और ‘ग्रीनलैंड विवाद’ के कारण वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। निवेशक जोखिम से बचने के लिए विकासशील देशों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर और सोने में निवेश कर रहे हैं, जिससे डॉलर की मजबूती बढ़ती जा रही है।
आम आदमी पर असर: शिक्षा, यात्रा और आयात पर मार
रुपये(Rupee) के कमजोर होने का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। भारत के लिए कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और अन्य वस्तुओं का आयात (Import) अब महंगा हो जाएगा, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ सकती है। सबसे ज्यादा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं; अब उन्हें फीस और रहने-खाने के लिए पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे। उदाहरण के लिए, जिस डॉलर के लिए पहले ₹80-85 देने पड़ते थे, अब उसके लिए लगभग ₹92 चुकाने पड़ रहे हैं।
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करेंसी की चाल और भविष्य का अनुमान
करेंसी की वैल्यू मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा भंडार और डॉलर की मांग-आपूर्ति पर निर्भर करती है। जब भारत के पास डॉलर की कमी होती है, तो रुपया(Rupee) कमजोर होने लगता है। मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, ₹92.00 का स्तर रुपये के लिए एक बड़ा रेजिस्टेंस (रुकावट) है। यदि वैश्विक तनाव में कमी आती है और कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं, तो रुपया वापस 90.50 से 90.70 के स्तर तक संभल सकता है। फिलहाल, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की दखलअंदाजी पर सबकी नजरें टिकी हैं।
विदेशी निवेशकों (FPI) की बिकवाली से रुपया कमजोर क्यों होता है?
जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालते हैं, तो वे निवेश के रूप में मिले ‘रुपये’ को वापस ‘डॉलर’ में बदलते हैं। इससे बाजार में डॉलर(Rupee) की मांग अचानक बढ़ जाती है और रुपये की सप्लाई अधिक हो जाती है। मांग और आपूर्ति के इसी असंतुलन के कारण डॉलर महंगा और रुपया सस्ता (कमजोर) हो जाता है।
‘करेंसी डेप्रिसिएशन’ का क्या अर्थ है?
जब किसी देश की मुद्रा की वैल्यू अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरी प्रमुख मुद्राओं (विशेषकर डॉलर) के मुकाबले गिर जाती है, तो उसे करेंसी डेप्रिसिएशन या मुद्रा का कमजोर होना कहते हैं। इसका मतलब है कि अब आपको उतनी ही विदेशी वस्तु खरीदने के लिए अपनी घरेलू मुद्रा के अधिक पैसे देने होंगे।
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