वॉशिंगटन। (NASA) ने अपने महत्वाकांक्षी मानवयुक्त चंद्र मिशन (Artemis II) को तकनीकी कारणों से फिलहाल स्थगित कर दिया है। यह मिशन मार्च में प्रस्तावित था और इसके तहत अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की परिक्रमा कर पृथ्वी पर लौटना था। नासा प्रमुख जेरेड आइजैकमैन ने बताया कि स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस) रॉकेट में हीलियम लीक की गंभीर समस्या सामने आई है। सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए रॉकेट और ओरियन अंतरिक्ष यान को लॉन्च पैड से हटाकर जांच के लिए वापस भेज दिया गया है।
हीलियम लीक क्यों है गंभीर समस्या?
रॉकेट प्रणाली में हीलियम गैस प्रोपेलेंट टैंक के भीतर आवश्यक दबाव बनाए रखने का काम करती है, जिससे इंजन को ईंधन की आपूर्ति सुचारू रहती है। हीलियम के रिसाव से इंजन के संचालन में बाधा आ सकती है और यह अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता था। इसी जोखिम को देखते हुए एसएलएस रॉकेट (SLS Rocekt) और ओरियन यान को व्हीकल असेंबली बिल्डिंग में भेज दिया गया है, जहां इंजीनियरों की टीम विस्तृत जांच और मरम्मत करेगी।
मिशन की रूपरेखा क्या थी?
आर्टेमिस-2 के तहत चार अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की कक्षा के पास तक भेजा जाना था। यह मिशन चंद्र सतह पर उतरने के लिए नहीं था, बल्कि भविष्य के मानव लैंडिंग मिशन की तैयारी के लिए एक अहम कदम माना जा रहा था। यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को शून्य-गुरुत्वाकर्षण वातावरण में सीमित केबिन में रहना था और पृथ्वी की निचली कक्षा से अधिक रेडिएशन का सामना करना पड़ता। वापसी के दौरान ओरियन कैप्सूल को वायुमंडलीय घर्षण के कारण तीव्र ताप और झटकों का सामना करते हुए प्रशांत महासागर में उतरना था।
आर्टेमिस कार्यक्रम का बड़ा लक्ष्य
आर्टेमिस-2 के बाद Artemis III के तहत इंसानों को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारने की योजना है। आगे चलकर आर्टेमिस-4 और 5 मिशनों के जरिए चंद्रमा की कक्षा में ‘गेटवे’ नामक स्पेस स्टेशन स्थापित करने की तैयारी है। नासा ने अंतिम बार 1970 के दशक में Apollo program के माध्यम से इंसानों को चंद्रमा पर भेजा था। दशकों बाद आर्टेमिस कार्यक्रम अंतरिक्ष अन्वेषण के नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
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सावधानी को दी गई प्राथमिकता
नासा प्रमुख ने कहा कि अंतरिक्ष मिशनों में जल्दबाजी के बजाय सुरक्षा सर्वोपरि होती है। 1960 के दशक के अपोलो मिशनों के दौरान भी कई तकनीकी चुनौतियां आई थीं, लेकिन सावधानीपूर्वक समाधान ही सफलता की कुंजी साबित हुआ। हालांकि मौजूदा तकनीकी व्यवधान से मिशन की समयरेखा प्रभावित हुई है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इन चुनौतियों को पार कर ही अंतरिक्ष विज्ञान नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है
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