“परमाणु हथियारों की जिद पड़ी भारी, सैन्य विकल्प भी खुले”
वाशिंगटन: अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान(Iran) को दुनिया में आतंकवाद का सबसे बड़ा केंद्र बताते हुए कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प(Donald Trump) का प्रशासन ईरान के “क्रूर और खतरनाक” शासन को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देगा। वेंस ने फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि हालांकि अमेरिका कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता है, लेकिन उसकी शांति की कोशिशों को कमजोरी न समझा जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कूटनीति विफल होती है, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।
मिडिल ईस्ट में सैन्य घेराबंदी और ‘मैक्सिमम प्रेशर’
जिनेवा में चल रही तीसरे दौर की बातचीत के बीच अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी(Iran) को काफी बढ़ा दिया है। पिछले कुछ दिनों में 50 से अधिक आधुनिक फाइटर जेट्स (F-22, F-35 और F-16) मिडिल ईस्ट के अलग-अलग एयरबेस, विशेषकर इजराइल(Israel) में तैनात किए गए हैं। इसके साथ ही वॉशिंगटन ‘मैक्सिमम प्रेशर’ अभियान के तहत ईरान पर नए और कड़े प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने आरोप लगाया है कि ईरान ऐसी मिसाइलें बना रहा है जो सीधे अमेरिका तक मार कर सकती हैं, जिससे तनाव चरम पर है।
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जिनेवा वार्ता और ईरान की जवाबी चेतावनी
तमाम धमकियों के बीच गुरुवार को जिनेवा में दोनों देशों के बीच तीसरे दौर(Iran) की वार्ता शुरू हो रही है। जहां एक ओर अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने अमेरिकी दबाव की रणनीति को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उस पर कोई हमला होता है, तो मिडिल ईस्ट में स्थित सभी अमेरिकी सैन्य अड्डे उसके निशाने पर होंगे। यह स्थिति क्षेत्र में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील हो गई है।
अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में भारी संख्या में फाइटर जेट्स क्यों तैनात किए हैं?
इसका मुख्य उद्देश्य ईरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना और बातचीत विफल होने की स्थिति में ‘सैन्य विकल्प’ को तैयार रखना है। यह तैनाती इजराइल और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी हितों की सुरक्षा के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है।
जेडी वेंस के अनुसार बातचीत का भविष्य किस पर निर्भर है?
उपराष्ट्रपति वेंस के अनुसार, बातचीत का अंतिम फैसला पूरी तरह से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हाथ में है। वे ही यह तय करेंगे कि कूटनीति अपनी सीमा तक पहुंच गई है या बातचीत को और समय दिया जाना चाहिए। यदि ईरान अमेरिकी शर्तों को मानने से इनकार करता है, तो ट्रम्प कड़े कदम उठा सकते हैं।
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