कपाल क्रिया का महत्व: हिंदू धर्म में देहांत को अंत नहीं बल्कि एक नई यात्रा की आरंभ माना जाता है। मौत के बाद लाश का अंतिम संस्कार अग्नि को समर्पित कर किया जाता है।
इस प्रक्रिया में एक सुस्पष्ट क्रिया होती है जिसे कपाल क्रिया कहा जाता है। कपाल क्रिया में दिवंगत के जलते हुए सिर पर लकड़ी या डंडे से प्रहार किया जाता है ताकि सिर का कड़ा भाग पूरी तरह अग्नि में समर्पित हो सके।
कपाल क्रिया का महत्व: कपाल क्रिया क्यों की जाती है?
मान्यता है कि तन के अन्य हिस्सों की तुलना में सिर अधिक सख्त होता है और देर से जलता है। यदि सिर अधजला रह जाए तो पूर्ण दाह संस्कार नहीं माना जाता। इसलिए सिर पर वार कर उसे तोड़ना ज़रूरी है ताकि वह पूरी तरह से राख हो जाए।

कपाल क्रिया का महत्व: आत्मा की मुक्ति में सहायता
आध्यात्मिक दृष्टि से कपाल क्रिया का लक्ष्य आत्मा को तन से पूर्ण रूप से मुक्तिदायक करना है। सिर के टूटने से आत्मा को बंधनों से मुक्ति मिलती है और वह अपनी अगली मार्ग के लिए आगे बढ़ पाती है।

तांत्रिक दुरुपयोग से बचाव
प्राचीन वक्त में यह आशंका रहती थी कि तांत्रिक चिता से अधजले सिर का दुरुपयोग कर सकते हैं। इसलिए कपाल क्रिया के जरिए सिर को तबाह कर दिया जाता है, जिससे ऐसे किसी भी दुरुपयोग की उम्मीद खत्म हो जाती है।

योगियों और सन्यासियों के साथ कपाल क्रिया क्यों नहीं?
तपस्वी या सन्यास मार्ग पर चलने वाले मनुष्ययों का सामान्य दाह संस्कार नहीं किया जाता। उन्हें समाधि दी जाती है क्योंकि वे पहले ही सांसारिक बंधनों से मुक्त माने जाते हैं। ऐसे में उनके साथ कपाल क्रिया जैसी प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती।