सरकार ने एयरलाइंस के विरोध के बाद बदला रुख
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने हाल ही में उस आदेश को स्थगित कर दिया है, जिसके तहत एयरलाइंस(AirLines) को अपनी 60% सीटें यात्रियों(Free Seat Selection) को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के चुनने देने का निर्देश दिया गया था। यह नियम 20 अप्रैल से लागू होना था, लेकिन नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने महज 15 दिनों के भीतर अपने फैसले को टालने का निर्णय लिया। सूत्रों के अनुसार, फिलहाल मौजूदा नियम ही प्रभावी रहेंगे, जब तक कि मंत्रालय इस विषय पर कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लेता।
एयरलाइंस की आपत्तियां और मंत्रालय की समीक्षा
इस फैसले(Decision) पर रोक लगाने का मुख्य कारण ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस’ द्वारा जताई गई आपत्तियां हैं। विमान कंपनियों का तर्क है कि इस नियम से उनके राजस्व और ऑपरेशनल मैनेजमेंट पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने मौजूदा डिरेगुलेटेड टैरिफ व्यवस्था (जहां किराया बाजार तय करता है) का हवाला देते हुए कहा कि इससे किराए के ढांचे में असंतुलन पैदा हो सकता है। इसी व्यापक जांच और समीक्षा के लिए सरकार ने आदेश को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
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यात्रियों पर वर्तमान व्यवस्था का असर
वर्तमान में, एयरलाइंस को केवल 20% सीटें ही मुफ्त चयन के लिए उपलब्ध करानी होती हैं। बाकी सीटों को ‘प्रेफर्ड सीट’ के नाम पर बेचा जाता है, जिसके लिए यात्री 500 रुपये से लेकर 3,000 रुपये तक अतिरिक्त भुगतान(Free Seat Selection) करते हैं। अगर 60% वाला नियम लागू हो जाता, तो वेब चेक-इन के दौरान यात्रियों के पास फ्री सीटों के अधिक विकल्प होते। नागरिक उड्डयन मंत्री का कहना है कि सरकार हवाई यात्रा को सुलभ बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन तकनीकी पेचों के कारण इस विशिष्ट फैसले पर अभी और मंथन की जरूरत है।
सरकार ने 60% मुफ्त सीट चयन के फैसले को क्यों स्थगित किया?
एयरलाइंस कंपनियों और ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस’ ने इस पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि इससे उनके बिजनेस मॉडल और टैरिफ सिस्टम पर बुरा असर पड़ेगा, जिसके बाद मंत्रालय ने इसकी व्यापक समीक्षा करने के लिए इसे रोक दिया।
अभी फ्लाइट में सीट बुक करने का क्या नियम है?
मौजूदा नियमों के अनुसार, एयरलाइंस को केवल 20% सीटें ही बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के उपलब्ध करानी होती हैं। शेष सीटों के लिए वे यात्रियों से उनकी पसंद के आधार पर अतिरिक्त चार्ज वसूल सकती हैं।
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