बेजोस और सांचेज का टिकाऊ भविष्य के लिए बड़ा निवेश
नई दिल्ली: अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस और उनकी पत्नी लॉरेन सांचेज ने फैशन इंडस्ट्री(Fashion Industry) को पर्यावरण के अनुकूल(Green Revolution) बनाने के लिए ₹2322 करोड़ की भारी राशि दान करने का निर्णय लिया है। यह निवेश ‘बेजोस अर्थ फंड’ के माध्यम से कोलंबिया यूनिवर्सिटी और यूसी बर्कले जैसे पांच प्रमुख संस्थानों को दिया जाएगा। इस फंड का मुख्य उद्देश्य लैब में बने फाइबर, बैक्टीरिया से निर्मित धागे और कृषि कचरे से कपड़े तैयार करने वाली तकनीकों को बढ़ावा देना है, ताकि अगले 3 से 5 वर्षों में ये इको-फ्रेंडली विकल्प आम ग्राहकों तक पहुंच सकें।
संघर्ष से प्रेरणा और इनोवेशन का लक्ष्य
लॉरेन सांचेज के लिए यह मुहिम बेहद व्यक्तिगत और भावुक है। बचपन(Childhood) में गरीबी के कारण उन्होंने अपनी ‘प्रोम ड्रेस’ खुद सिली थी। आज वे उसी सिलाई की समझ और अपनी संपत्ति का उपयोग फैशन के भविष्य को बदलने में कर रही हैं। यह प्रोजेक्ट न केवल मशरूम और समुद्री कचरे से बनने वाले टिकाऊ कपड़ों की उत्पादन लागत को कम करेगा, बल्कि पॉलिएस्टर जैसे सिंथेटिक मटेरियल और जीवाश्म ईंधन पर दुनिया की निर्भरता को भी काफी हद तक कम करने में मदद करेगा।
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सस्टेनेबल टेक्सटाइल और रिसर्च पर जोर
इस अनुदान का एक बड़ा हिस्सा कपास की जेनेटिक्स और औद्योगिक कचरे से रेशम जैसे धागे बनाने के शोध पर खर्च किया जाएगा। वर्तमान में इको-फ्रेंडली कपड़ों का निर्माण काफी महंगा है, लेकिन इस बड़े निवेश से इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) संभव हो पाएगा। चूंकि अमेजन दुनिया की सबसे बड़ी कपड़ा रिटेलर है, इसलिए सांचेज का यह कदम वैश्विक स्तर पर प्रदूषण कम करने और सुरक्षित उत्पादन पद्धतियों को लागू करने की दिशा में एक क्रांतिकारी मोड़ माना जा रहा है।
जेफ बेजोस और लॉरेन सांचेज द्वारा दिए गए दान का मुख्य लक्ष्य क्या है?
इस दान का मुख्य लक्ष्य फैशन इंडस्ट्री से होने वाले प्रदूषण को कम करना है। यह पैसा लैब में बने फाइबर, बैक्टीरिया से बने धागे और खेती के कचरे से कपड़े बनाने वाली रिसर्च पर खर्च होगा, ताकि भविष्य में सस्ते और पर्यावरण के अनुकूल कपड़े बाजार में उपलब्ध हो सकें।
लॉरेन सांचेज का यह फैसला उनके बचपन से किस प्रकार प्रेरित है?
लॉरेन का बचपन संघर्षों में बीता था। उनके पास हाई स्कूल प्रोम के लिए ड्रेस खरीदने के पैसे नहीं थे, जिसके कारण उन्होंने अपनी दादी से सिलाई सीखकर खुद अपनी ड्रेस बनाई थी। यही कारण है कि वे अब वैज्ञानिकों की मदद कर फैशन के पारंपरिक और प्रदूषणकारी तरीकों को बदलना चाहती हैं।
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