Tariff War: यूरोपियन यूनियन का ट्रंप को झटका; भारत-चीन पर 100% टैरिफ का प्रस्ताव खारिज

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Trump Tariff
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ब्रसेल्स, 11 सितम्बर 2025 – अमेरिका (America) के पूर्व राष्ट्रपति और मौजूदा चुनावी दौर में फिर से सुर्खियों में आए डोनाल्ड ट्रंप को यूरोपीय यूनियन (EU) ने बड़ा झटका दिया है। ट्रंप ने हाल ही में एक बयान दिया था कि अमेरिका को चीन और भारत जैसे बड़े निर्यातक देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाना चाहिए, ताकि अमेरिकी इंडस्ट्री को मजबूती मिले और घरेलू नौकरियों की रक्षा हो सके। लेकिन यूरोपीय यूनियन ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया

यूरोपीय यूनियन का रुख

EU नेताओं का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर टैरिफ लगाना न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे ग्लोबल इकोनॉमी में अस्थिरता बढ़ेगी। यूरोपीय आयोग ने साफ कहा कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के नियमों के तहत इस तरह की पाबंदी लगाना वैध नहीं है।

भारत और चीन का महत्व

भारत और चीन दुनिया की सबसे बड़ी सप्लाई चेन का हिस्सा हैं। अमेरिका और यूरोप दोनों ही देशों से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल, फार्मा और ऑटो पार्ट्स आयात करते हैं। ऐसे में अचानक 100% टैरिफ लागू करना मतलब सीधे-सीधे महंगाई बढ़ाना और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालना।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम अमेरिका की घरेलू कंपनियों को तो थोड़े समय के लिए लाभ पहुँचा सकता है, लेकिन लंबे समय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों और व्यापार संतुलन पर भारी असर पड़ेगा।

ट्रंप की सोच और आलोचना

ट्रंप का कहना है कि भारत और चीन सस्ते उत्पाद बनाकर अमेरिकी बाजार में बाढ़ ला देते हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियाँ टिक नहीं पातीं। वे चाहते हैं कि कड़े टैरिफ लगाकर विदेशी सामान को महंगा किया जाए और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा मिले।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि ट्रंप का यह रवैया “इकोनॉमिक नेशनलिज़्म” को बढ़ावा देता है और इससे अमेरिका अपने पुराने सहयोगियों से भी दूर हो सकता है।

वैश्विक असर

अगर अमेरिका इस तरह का कोई फैसला लेता है और बाकी देश उसका अनुसरण करते हैं, तो यह एक नई ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) को जन्म देगा। इसका सीधा असर ग्लोबल सप्लाई चेन, निवेश और रोज़गार पर पड़ेगा। यूरोपियन यूनियन का साफ कहना है कि आज की जुड़ी हुई अर्थव्यवस्था में इस तरह के अलगाववादी कदम उल्टा नुकसान करेंगे।

नतीजा

EU का यह फैसला ट्रंप के लिए कूटनीतिक झटका है। इससे साफ है कि अमेरिका के भीतर भले ही “प्रोटेक्शनिज्म” की मांग तेज़ हो रही हो, लेकिन यूरोप फिलहाल खुले और संतुलित व्यापार के पक्ष में खड़ा है। आने वाले महीनों में यह बहस और तेज़ होगी क्योंकि ट्रंप का यह एजेंडा अमेरिकी चुनाव प्रचार का अहम हिस्सा बन चुका है।

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लेखक परिचय

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