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Britain: ब्रिटेन-चीन संबंधों में नया मोड़

Dhanarekha
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Britain: ब्रिटेन-चीन संबंधों में नया मोड़

‘शत्रुता’ से ‘व्यावहारिक साझेदारी’ तक का सफर

लंदन: कीर स्टार्मर की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिकी(Britain) राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ और आक्रामक टैरिफ(Aggressive Tariffs) नीतियों ने यूरोपीय देशों को चिंता में डाल दिया है। ब्रिटेन अब यह समझ चुका है कि वह केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता। स्टार्मर ने स्पष्ट किया है कि ब्रिटेन को अमेरिका और चीन में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। जहां एक तरफ अमेरिका सुरक्षा साझेदार है, वहीं चीन एक ऐसी आर्थिक हकीकत है जिसे नजरअंदाज करना ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती हो सकता है

हुआवे विवाद और सुरक्षा की चुनौतियां

पिछले कुछ वर्षों में ब्रिटेन और चीन के रिश्ते काफी तनावपूर्ण रहे हैं। 2020 में कोरोना काल के दौरान ब्रिटेन ने सुरक्षा कारणों और जासूसी(Britain) के शक में चीनी टेक दिग्गज ‘हुआवे’ (Huawei) को अपने 5G नेटवर्क से बाहर कर दिया था। ‘द सेल’ जैसे निगरानी तंत्र के बावजूद भरोसे की कमी ने रिश्तों में ‘बर्फानी युग’ (Ice Age) ला दिया था। हालांकि, अब स्टार्मर सरकार पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़कर एक मध्यम मार्ग तलाश रही है। हाल ही में लंदन में चीन को बड़ा दूतावास बनाने की मंजूरी देना इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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आर्थिक मजबूरी बनाम मानवाधिकार का सवाल

स्टार्मर के इस दौरे का प्राथमिक उद्देश्य व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना है। वह अपने साथ बड़ी ब्रिटिश कंपनियों के अधिकारियों(Britain) को भी ले गए हैं। 2015 के ‘गोल्डन एरा’ (जब शी जिनपिंग और डेविड कैमरन ने पब में बीयर पी थी) की तुलना में आज का दौर अधिक व्यावहारिक है। ब्रिटेन को अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए चीनी निवेश की दरकार है। हालांकि, उन्हें घर में चीन के मानवाधिकार रिकॉर्ड (विशेषकर शिनजियांग और हांगकांग) को लेकर आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। चुनौती यह है कि आर्थिक लाभ और राष्ट्रीय मूल्यों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

कीर स्टार्मर की इस यात्रा को ‘व्यावहारिक कूटनीति’ क्यों कहा जा रहा है?

इसे व्यावहारिक इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि ब्रिटेन अब चीन को न तो पूरी तरह दोस्त मान रहा है और न ही कट्टर दुश्मन। स्टार्मर की नीति ‘दुश्मनी’ के बजाय ‘जरूरत’ पर आधारित है। वे जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक व्यापार जैसे मुद्दों पर चीन के बिना प्रगति संभव नहीं है, भले ही सुरक्षा के मोर्चे पर मतभेद बरकरार हों।

2020 में हुआवे को लेकर ब्रिटेन का रुख क्या था और अब इसमें क्या बदलाव आया है?

2020 में ब्रिटेन(Britain) ने हुआवे को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए 5G इंफ्रास्ट्रक्चर से पूरी तरह हटा दिया था। उस समय ब्रिटेन का झुकाव अमेरिकी दबाव में ‘चीन से दूरी’ बनाने की ओर था। अब बदलाव यह है कि सुरक्षा चिंताओं को बरकरार रखते हुए भी ब्रिटेन अन्य आर्थिक क्षेत्रों (जैसे वित्त और व्यापार) में चीन के साथ फिर से जुड़ना चाहता है ताकि मंदी के दौर से बाहर निकला जा सके।

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