NATO देशों ने ईरान के खिलाफ जंग में साथ देने से किया इनकार
वाशिंगटन: ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई समेत कई शीर्ष अधिकारियों की मौत के बाद अमेरिका(Hormuz Crisis) को इस युद्ध में बड़ी जीत की उम्मीद थी, लेकिन 17 दिन बाद स्थिति बदल गई है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के रास्ते तेल आपूर्ति रोकने से वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो (NATO) देशों से समुद्री रास्ता खुलवाने के लिए सैन्य मदद मांगी है, लेकिन जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे प्रमुख सहयोगियों ने साफ कर दिया है कि वे अपने युद्धपोत नहीं भेजेंगे। जर्मनी(Germany) का कहना है कि बमबारी से किसी देश को झुकाना सही तरीका नहीं है, जबकि ब्रिटेन इस बड़े युद्ध में फंसने से बचना चाहता है।
वैश्विक तेल आपूर्ति और कूटनीतिक दबाव
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लिए बेहद अहम है क्योंकि यहाँ से विश्व के लगभग 20% तेल और गैस की सप्लाई होती है। वर्तमान में ईरान के नियंत्रण(Hormuz Crisis) के कारण यह मार्ग बाधित है। ट्रम्प ने चेतावनी दी है कि जो देश इस रास्ते का लाभ उठाते हैं, उन्हें इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए, अन्यथा नाटो का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। इसके बावजूद, यूरोपीय यूनियन ने अपने रेड सी (लाल सागर) मिशन का दायरा होर्मुज तक बढ़ाने से मना कर दिया है। यूरोपीय देशों का मानना है कि इस संकट का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और बातचीत से ही निकलना चाहिए।
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इजराइल की रणनीति और ईरान की चेतावनी
एक तरफ जहाँ अमेरिका कूटनीतिक मोर्चे पर अकेला पड़ता दिख रहा है, वहीं इजराइल ने ईरान के तेहरान, शिराज और तबरीज जैसे शहरों(Hormuz Crisis) पर हमले तेज कर दिए हैं। इजराइली सेना का दावा है कि उनके पास अगले तीन हफ्तों की पूरी प्लानिंग तैयार है और उनका लक्ष्य ईरान के मिसाइल ढांचे और परमाणु ठिकानों को कमजोर करना है। दूसरी ओर, ईरान ने कड़ी चेतावनी दी है कि यदि अमेरिकी सेना जमीन पर उतरी, तो उसे ‘वियतनाम’ जैसा अंजाम भुगतना होगा। इस युद्ध में अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लेबनान में भी इजराइल की जमीनी कार्रवाई जारी है।
होर्मुज स्ट्रेट का वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए क्या महत्व है?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है क्योंकि दुनिया की कुल तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20% इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। इसके बंद होने से वैश्विक तेल की कीमतों में भारी उछाल और आर्थिक अस्थिरता आ सकती है।
जर्मनी और इटली ने इस युद्ध में शामिल होने को लेकर क्या तर्क दिया है?
जर्मनी का मानना है कि यह ‘यूरोप की जंग’ नहीं है और बमबारी से सरकारें नहीं बदली जानी चाहिए। इटली का कहना है कि उनके वर्तमान मिशन केवल रक्षा और समुद्री डकैती रोकने के लिए हैं, उन्हें पूर्ण युद्ध में नहीं बदला जा सकता; हल केवल बातचीत से ही संभव है।
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