‘राष्ट्रीय हित’ और ‘बाजार’ के बीच ऊर्जा कूटनीति
मास्को: रूस ने स्पष्ट किया है कि भारत(India) अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी भी देश से कच्चा तेल खरीदने के लिए स्वतंत्र है। रूसी प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव के अनुसार, रूस(Russia) कभी भी भारत का एकमात्र ऊर्जा साझेदार नहीं रहा है और उन्हें भारत की ओर से तेल खरीद रोकने की कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। दूसरी ओर, भारत सरकार ने भी जोर देकर कहा है कि 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत की विदेश नीति किसी बाहरी दबाव के बजाय राष्ट्रीय हितों और व्यावसायिक लाभ पर आधारित है।
ट्रम्प का दावा बनाम तकनीकी चुनौतियां
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प(Donald Trump) ने दावा किया है कि भारत, अमेरिका के साथ हुए ट्रेड डील के बदले रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। हालांकि, ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह इतना आसान नहीं है। अमेरिकी तेल ‘हल्का’ होता है, जबकि भारतीय(India) रिफाइनरियां रूस के ‘यूराल्स क्रूड’ (भारी और सल्फर युक्त) के लिए तैयार हैं। यदि भारत रूसी तेल छोड़ता है, तो उसे अमेरिकी तेल को अन्य ग्रेड के साथ ब्लेंड करना पड़ेगा, जिससे उत्पादन लागत बढ़ेगी। साथ ही, अमेरिका के पास रूस जितनी बड़ी मात्रा (1.5-2 मिलियन बैरल प्रतिदिन) की आपूर्ति करने वाली सप्लाई चेन फिलहाल मौजूद नहीं है।
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बदलते बाजार समीकरण और वेनेजुएला का विकल्प
दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत(India) रूस से तेल खरीदने के मामले में तीसरे स्थान पर आ गया है, जबकि चीन पहले और तुर्किये दूसरे स्थान पर है। रिलायंस जैसी बड़ी भारतीय कंपनियों ने अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से रूसी तेल की खरीद कम की है। इस बीच, भारत वेनेजुएला जैसे पुराने साझेदारों की ओर भी देख रहा है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, भारत अब आपूर्ति के स्रोतों में विविधता ला रहा है ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके और वैश्विक बाजार में कीमतों की स्थिरता बनी रहे।
रूसी विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय रिफाइनरियों के लिए अमेरिकी तेल खरीदना क्यों महंगा पड़ सकता है?
रूसी तेल भारी और सल्फर वाला होता है जिसे भारतीय(India) रिफाइनरियां आसानी से प्रोसेस करती हैं। अमेरिकी तेल हल्का होता है, जिसे मशीनों के अनुकूल बनाने के लिए दूसरे तेलों के साथ ब्लेंड (मिश्रण) करना पड़ेगा। इस प्रक्रिया से रिफाइनिंग की लागत बढ़ जाएगी और भारतीय कंपनियों को आर्थिक नुकसान हो सकता है।
भारत और रूस के बीच व्यापारिक संबंधों पर तेल खरीद का क्या असर पड़ सकता है?
वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों का व्यापार $68.7 अरब तक पहुंच गया था, जिसमें $52.7 अरब का हिस्सा अकेले कच्चे तेल का था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत रूसी तेल पूरी तरह बंद कर देता है, तो द्विपक्षीय व्यापार घटकर $20 अरब से भी नीचे आ सकता है।
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