Iran Nuclear Plant पर Israel Attack से बढ़ा Radiation खतरा IAEA की रिपोर्ट से मचा हड़कंप
ईरान के परमाणु संयंत्र पर कथित इजरायली हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि Iran Nuclear Plant पर हमले से रेडियो एक्टिव रिसाव हो रहा है, जो क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
क्या कहा IAEA ने?
IAEA के निरीक्षकों ने हाल ही में ईरान के नतांज और फोर्दो संयंत्रों का दौरा किया। रिपोर्ट के अनुसार:
- संयंत्र में सामान्य से अधिक रेडियोधर्मी तत्व पाए गए हैं।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल में कमी देखी गई है।
- रिसाव की पुष्टि के लिए और परीक्षण की जरूरत बताई गई है।
Iran Nuclear Plant पर यह हमला ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया में पहले से ही तनाव का माहौल है।

तेहरान ने आरोपों को किया खारिज
ईरानी विदेश मंत्रालय ने IAEA की रिपोर्ट को “राजनीति से प्रेरित और असत्य” बताया। तेहरान का कहना है:
- संयंत्र पूरी तरह सुरक्षित है।
- किसी तरह के रिसाव की पुष्टि नहीं हुई है।
- IAEA के दावे इजरायली प्रोपेगेंडा से प्रभावित हैं।
इजरायल की ओर से क्या बयान आया?
इजरायल ने इस हमले की पुष्टि नहीं की है, लेकिन एक रक्षा अधिकारी ने कहा कि “ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना हमारा कर्तव्य है।” इससे पहले भी इजरायल ईरानी संयंत्रों को निशाना बनाता रहा है।
क्यों चिंता का विषय है यह हमला?
Iran Nuclear Plant पर रेडियो एक्टिव रिसाव की खबर से कई सवाल खड़े हो रहे हैं:
- क्या यह हमला अंतरराष्ट्रीय परमाणु नियमों का उल्लंघन है?
- क्या इससे पर्यावरण और जनजीवन पर असर पड़ेगा?
- क्या इससे ईरान और इजरायल के बीच युद्ध छिड़ सकता है?

संभावित खतरे:
- पड़ोसी देशों में रेडिएशन का प्रभाव
- संयुक्त राष्ट्र और IAEA की कार्रवाई की मांग
- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव
IAEA की संभावित कार्रवाई
IAEA ने कहा है कि वे ईरान के संयंत्रों की सुरक्षा की विस्तृत समीक्षा करेंगे और एक विस्तृत रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र को सौंपेंगे। अगर ईरान परमाणु संयंत्र में रिसाव की पुष्टि होती है, तो यह ईरान के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव को और बढ़ा देगा।
Iran Nuclear Plant पर हुआ यह कथित इजरायली हमला सिर्फ दो देशों के बीच का मामला नहीं रह गया है। इससे पूरे विश्व की परमाणु सुरक्षा नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध और पर्यावरणीय स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अब देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और शक्तियां इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती हैं।